
बृहस्पति चालीसा देवगुरु बृहस्पति को समर्पित एक लोकप्रिय भक्तिपरक स्तुति है। हिंदू धार्मिक परंपरा में बृहस्पति को देवताओं का गुरु, ज्ञान और सद्बुद्धि का प्रतीक तथा धर्म, नीति और आध्यात्मिक मार्गदर्शन से जुड़ा देवता माना जाता है। गुरुवार को उनकी उपासना करने की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है और इसी कारण बृहस्पति चालीसा का पाठ भी इस दिन किया जाता है।
बृहस्पति चालीसा को केवल किसी विशेष समस्या का धार्मिक उपाय मानकर पढ़ना इसके व्यापक भाव को छोटा कर देना होगा। इसकी मूल भावना गुरु-तत्व, ज्ञान, विवेक, धर्म, विनम्रता और सही दिशा से जुड़ी है। जैसे अंधेरे रास्ते पर एक अनुभवी व्यक्ति हाथ में दीपक लेकर आगे चलता है, वैसे ही भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में गुरु उस प्रकाश का प्रतीक है जो व्यक्ति को भ्रम से निकालकर समझ और विवेक की ओर ले जाता है। इसलिए जब कोई भक्त बृहस्पति चालीसा पढ़ता है, तो वह केवल धन या सफलता की कामना नहीं करता, बल्कि अपने भीतर बेहतर निर्णय लेने की क्षमता और धर्मसम्मत जीवन जीने की शक्ति की भी प्रार्थना कर सकता है। धार्मिक स्रोतों में बृहस्पति को ज्ञान, शिक्षा, बुद्धि और शुभता से जोड़ा गया है।
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पौराणिक परंपरा में बृहस्पति देव को देवताओं का गुरु कहा गया है। उन्हें ऋषि अंगिरा का पुत्र माना जाता है और उनके लिए वाचस्पति, सुरगुरु तथा देवगुरु जैसे नामों का प्रयोग मिलता है। बृहस्पति का स्वरूप ज्ञान, वाणी, धर्म और मार्गदर्शन से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि उनकी उपासना में केवल भौतिक समृद्धि की इच्छा नहीं, बल्कि विवेक और सही मार्ग की भावना भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। विभिन्न धार्मिक और ज्योतिषीय परंपराओं में गुरु या बृहस्पति को शुभ ग्रह के रूप में वर्णित किया गया है और उन्हें विस्तार, ज्ञान, धर्म तथा समृद्धि जैसे विषयों से जोड़ा जाता है।
देवगुरु की अवधारणा को समझने का एक सरल तरीका यह है कि गुरु व्यक्ति को केवल जानकारी नहीं देता, बल्कि जानकारी का सही उपयोग करना भी सिखाता है। किसी व्यक्ति के पास बहुत पैसा हो सकता है, लेकिन यदि निर्णय लेने का विवेक नहीं है तो वही धन परेशानी का कारण बन सकता है। इसी तरह डिग्री होना और वास्तव में ज्ञानवान होना दो अलग बातें हैं। बृहस्पति की धार्मिक अवधारणा इन दोनों के बीच के अंतर को समझने में मदद करती है। इसलिए बृहस्पति चालीसा का भाव केवल बाहरी उपलब्धियों तक सीमित नहीं है; इसमें जीवन को सही दिशा देने वाले ज्ञान और धर्म की प्रार्थना भी दिखाई देती है।
बृहस्पति देव का धार्मिक महत्व उनकी गुरु की भूमिका से सबसे अधिक जुड़ा है। भारतीय परंपरा में गुरु का स्थान इसलिए ऊँचा माना गया है क्योंकि गुरु अज्ञान को हटाकर ज्ञान का मार्ग दिखाता है। बृहस्पति चालीसा में भी बृहस्पति के अनेक गुणों का स्मरण कराया जाता है और उनसे भक्तों के कल्याण, ज्ञान तथा संकट से रक्षा की प्रार्थना की जाती है। प्रचलित पाठों में बृहस्पति को भक्तहितकारी, सुरगुरु और वाचस्पति जैसे विशेषणों से संबोधित किया गया है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। धार्मिक स्तोत्र का प्रभाव केवल शब्दों की संख्या में नहीं, बल्कि श्रद्धा, नियमितता और भाव में भी देखा जाता है। यदि कोई व्यक्ति चालीसा बहुत तेजी से पढ़कर केवल एक काम पूरा करने जैसा व्यवहार करे, तो उसके लिए यह एक यांत्रिक गतिविधि बन सकती है। इसके विपरीत यदि वही व्यक्ति कुछ मिनट शांत होकर बृहस्पति के गुणों का चिंतन करे, अपनी गलतियों को स्वीकार करे और जीवन में ज्ञान तथा अनुशासन अपनाने का संकल्प ले, तो पाठ का आध्यात्मिक महत्व उसके लिए कहीं अधिक गहरा हो सकता है।
बृहस्पति चालीसा बृहस्पति देव की स्तुति का एक भक्तिपरक पाठ है, जिसमें उनके स्वरूप, गुण, कृपा और भक्तों के प्रति कल्याणकारी भाव का वर्णन किया जाता है। चालीसा का उद्देश्य केवल बृहस्पति की प्रशंसा करना नहीं है। इसमें भक्त और देवता के बीच उस संबंध को व्यक्त किया जाता है जिसमें भक्त अपने अज्ञान, कमजोरियों और जीवन की कठिनाइयों को स्वीकार करके मार्गदर्शन की प्रार्थना करता है। प्रचलित पाठ में बृहस्पति को ज्ञान, धर्म और धन से जुड़े दाता के रूप में स्मरण किया गया है। इसका प्रतीकात्मक अर्थ यह लिया जा सकता है कि वास्तविक समृद्धि केवल बैंक खाते में जमा धन नहीं है; ज्ञान, अच्छे संस्कार, सही निर्णय, सम्मान और मानसिक संतुलन भी जीवन की बड़ी संपत्तियाँ हैं।
“चालीसा” शब्द सामान्यतः चालीस चौपाइयों वाले भक्तिपरक पाठ के लिए इस्तेमाल किया जाता है। बृहस्पति चालीसा के प्रचलित संस्करणों में दोहे के साथ बृहस्पति देव की महिमा का वर्णन करने वाली चौपाइयाँ मिलती हैं। कुछ स्रोत इसे ज्ञान, शिक्षा, धर्म, समृद्धि और गुरु-कृपा से जोड़ते हैं।
इसकी भाषा में भक्तिपूर्ण विनम्रता दिखाई देती है। भक्त स्वयं को सर्वज्ञ मानने के बजाय गुरु के सामने सीखने वाला व्यक्ति मानता है। यही भाव चालीसा की सबसे सुंदर विशेषताओं में से एक है। जीवन में जब कोई व्यक्ति यह स्वीकार करता है कि उसे हर बात नहीं आती और उसे सीखने की आवश्यकता है, तभी वास्तविक विकास शुरू होता है। इस दृष्टि से बृहस्पति चालीसा को आत्मचिंतन की एक छोटी-सी आध्यात्मिक प्रक्रिया भी माना जा सकता है।
गुरुवार, जिसे बृहस्पतिवार या वीरवार भी कहा जाता है, पारंपरिक रूप से बृहस्पति देव की पूजा का दिन माना जाता है। कई धार्मिक स्रोत गुरुवार को बृहस्पति चालीसा, बृहस्पति मंत्र और अन्य गुरु-संबंधी स्तोत्रों के पाठ के लिए विशेष दिन बताते हैं। कुछ परंपराओं में इस दिन पीले वस्त्र, पीले फूल, चने की दाल, गुड़ और पीले खाद्य पदार्थों का प्रयोग या दान करने की मान्यता भी मिलती है।
गुरुवार की साधना का एक व्यावहारिक पक्ष भी है। सप्ताह में एक निश्चित दिन पूजा करने से व्यक्ति के भीतर नियमितता आती है। अगर हर गुरुवार सुबह कुछ मिनट मोबाइल और रोजमर्रा की भागदौड़ से दूर बैठकर प्रार्थना की जाए, तो मन को स्थिर करने का अवसर मिलता है। इसे आप सप्ताह की मानसिक “रीसेट बटन” की तरह समझ सकते हैं। धार्मिक विश्वास अपनी जगह है, लेकिन नियमित प्रार्थना, आत्मनिरीक्षण और अनुशासन व्यक्ति की दिनचर्या में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।
लोग अलग-अलग उद्देश्यों से बृहस्पति चालीसा का पाठ करते हैं। कुछ लोग इसे ज्ञान और बुद्धि के लिए पढ़ते हैं, कुछ शिक्षा और करियर में सफलता की कामना से, जबकि कुछ परिवार विवाह, संतान, आर्थिक स्थिरता या गुरु ग्रह से जुड़ी ज्योतिषीय मान्यताओं के कारण इसका पाठ करते हैं। धार्मिक मीडिया में भी बृहस्पति चालीसा को ज्ञान, विवेक, शिक्षा, वैवाहिक जीवन और गुरु संबंधी दोषों की शांति से जोड़ा गया है।
हालाँकि इन लाभों को धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के रूप में समझना चाहिए, वैज्ञानिक रूप से सिद्ध उपचार या गारंटी के रूप में नहीं। उदाहरण के लिए परीक्षा में सफलता केवल चालीसा पढ़ने से सुनिश्चित नहीं होती; पढ़ाई, अभ्यास, नींद, समय-प्रबंधन और परीक्षा रणनीति भी जरूरी हैं। इसी तरह विवाह या आर्थिक स्थिति जैसे जीवन के बड़े निर्णयों में वास्तविक परिस्थितियों और व्यावहारिक कदमों की भूमिका बनी रहती है। सबसे संतुलित दृष्टिकोण यही है कि धार्मिक साधना को मानसिक और आध्यात्मिक अनुशासन के साथ जोड़ा जाए।
बृहस्पति को ज्ञान और विवेक का प्रतीक मानने के कारण विद्यार्थी और सीखने वाले लोग उनकी उपासना करते हैं। चालीसा पढ़ते समय केवल परीक्षा में अच्छे अंक मांगने के बजाय एकाग्रता, स्मरणशक्ति, सही निर्णय और निरंतर अध्ययन की शक्ति की प्रार्थना करना अधिक अर्थपूर्ण हो सकता है। गुरु की अवधारणा व्यक्ति को यह भी याद दिलाती है कि ज्ञान प्राप्त करना जीवनभर चलने वाली प्रक्रिया है।
यदि कोई विद्यार्थी गुरुवार को चालीसा पढ़ता है, तो उसके साथ एक छोटा व्यावहारिक नियम भी बनाया जा सकता है। उदाहरण के लिए पाठ के बाद उस दिन दो घंटे बिना मोबाइल के अध्ययन करना, किसी कठिन विषय की पुनरावृत्ति करना या अगले सप्ताह की पढ़ाई की योजना बनाना। इस तरह आध्यात्मिक विश्वास और वास्तविक प्रयास एक-दूसरे के विरोधी नहीं रहते, बल्कि साथ-साथ चल सकते हैं।
वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति या गुरु को महत्वपूर्ण ग्रह माना जाता है। पारंपरिक ज्योतिष में गुरु को धनु और मीन राशियों का स्वामी तथा कर्क राशि में उच्च और मकर राशि में नीच माना जाता है। इन ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार कुंडली में गुरु की स्थिति शिक्षा, धर्म, संतान, विवाह, भाग्य और विस्तार जैसे विषयों से संबंधित मानी जाती है।
इसी आधार पर कमजोर या प्रतिकूल गुरु की स्थिति के लिए लोग गुरुवार का व्रत, बृहस्पति चालीसा, मंत्र-जप, पीली वस्तुओं का दान और गुरु पूजा जैसे उपाय करते हैं। यहाँ सावधानी जरूरी है: ज्योतिषीय उपायों को आस्था की परंपरा के रूप में लेना उचित है, लेकिन स्वास्थ्य, शिक्षा, विवाह, कानून या वित्त जैसे महत्वपूर्ण निर्णय केवल ज्योतिषीय उपायों के भरोसे नहीं छोड़ने चाहिए। यदि कोई व्यक्ति कुंडली के आधार पर उपाय करना चाहता है, तो किसी योग्य और विश्वसनीय ज्योतिष विशेषज्ञ से व्यक्तिगत कुंडली के संदर्भ में सलाह लेना बेहतर है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बृहस्पति चालीसा के पाठ से ज्ञान, विवेक, शिक्षा, धार्मिक भावना, मानसिक शांति और समृद्धि से जुड़े शुभ परिणामों की कामना की जाती है। कुछ प्रचलित स्रोत विवाह में देरी, आर्थिक उन्नति और गुरु ग्रह से जुड़े दोषों की शांति को भी इसके संभावित धार्मिक लाभों में गिनाते हैं।
इन लाभों को समझते समय एक सुंदर अंतर ध्यान में रखना चाहिए—“लाभ” का अर्थ हमेशा चमत्कार नहीं होता। नियमित प्रार्थना से व्यक्ति में धैर्य और अनुशासन बढ़ सकता है; गुरु के गुणों का चिंतन उसे अपने व्यवहार पर विचार करने के लिए प्रेरित कर सकता है; और धार्मिक दिनचर्या मानसिक स्थिरता का अवसर दे सकती है। जब इन गुणों के साथ वास्तविक कर्म जुड़ता है, तब व्यक्ति अपनी परिस्थितियों को बेहतर तरीके से संभाल सकता है। इसलिए बृहस्पति चालीसा को प्रार्थना + आत्मचिंतन + सकारात्मक कर्म के रूप में देखना अधिक संतुलित दृष्टिकोण है।
विद्यार्थियों तथा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वालों के लिए बृहस्पति की उपासना का संबंध विशेष रूप से ज्ञान और बुद्धि से जोड़ा जाता है। लेकिन किसी भी परीक्षा की सफलता का वास्तविक आधार पढ़ाई है। इसलिए चालीसा पढ़ने के बाद अध्ययन की एक ठोस योजना बनाना ज्यादा प्रभावी तरीका है। उदाहरण के लिए गुरुवार को पाठ के बाद पिछले सात दिनों की गलतियों की समीक्षा, अगले सात दिनों का लक्ष्य और कठिन विषयों की सूची तैयार की जा सकती है।
करियर में भी गुरु-तत्व का अर्थ केवल पद या वेतन नहीं है। सही सलाह लेना, अनुभवी लोगों से सीखना, नैतिक निर्णय लेना और लगातार अपनी क्षमता बढ़ाना गुरु-तत्व की व्यावहारिक अभिव्यक्तियाँ हो सकती हैं। यदि कोई व्यक्ति हर गुरुवार अपने करियर के बारे में ईमानदारी से दस मिनट सोचता है—मैं क्या सीख रहा हूँ, कहाँ गलती कर रहा हूँ और अगले सप्ताह क्या सुधारूँगा—तो वह चालीसा के आध्यात्मिक भाव को वास्तविक जीवन से जोड़ सकता है।
ज्योतिषीय परंपरा में बृहस्पति को विवाह और पारिवारिक जीवन से जुड़े कई विषयों के साथ जोड़ा जाता है। विशेष रूप से विवाह में देरी या गुरु की प्रतिकूल स्थिति के संदर्भ में लोग गुरुवार का व्रत और बृहस्पति चालीसा का पाठ करते हैं। धार्मिक स्रोत भी ऐसी मान्यताओं का उल्लेख करते हैं।
लेकिन यहाँ भी संतुलित दृष्टिकोण जरूरी है। विवाह केवल ग्रहों का विषय नहीं है; इसमें आपसी सम्मान, संवाद, आर्थिक समझ, परिवारों की अपेक्षाएँ और व्यक्तिगत अनुकूलता जैसे वास्तविक पहलू शामिल हैं। यदि कोई व्यक्ति विवाह के लिए बृहस्पति चालीसा पढ़ता है, तो उसके साथ स्वयं के व्यवहार, संवाद कौशल और जीवनसाथी के प्रति अपेक्षाओं पर विचार करना भी उपयोगी है। प्रार्थना मन को दिशा दे सकती है, लेकिन स्वस्थ संबंध बनाने के लिए दोनों व्यक्तियों के प्रयास आवश्यक रहते हैं।
बृहस्पति को पारंपरिक ज्योतिष में विस्तार, शुभता और समृद्धि से जोड़ा जाता है। इसलिए बृहस्पति चालीसा का पाठ धन और आर्थिक स्थिरता की कामना से भी किया जाता है। कुछ प्रचलित धार्मिक पाठों में बृहस्पति को धर्म और धन का दाता कहा गया है।
इसका अर्थ केवल अधिक पैसा प्राप्त करना नहीं होना चाहिए। धन के साथ विवेक हो, आय का स्रोत उचित हो, खर्च नियंत्रित हो और जरूरतमंद की सहायता करने की भावना हो—ये बातें भी समृद्धि के व्यापक अर्थ में आती हैं। गुरुवार को चने की दाल, पीले अन्न या अन्य वस्तुओं के दान की परंपरा इसी सेवा और त्याग की भावना से जोड़ी जाती है।
बृहस्पति चालीसा के पाठ के लिए किसी जटिल प्रक्रिया की अनिवार्यता नहीं मानी जाती, लेकिन पारंपरिक पूजा में शुद्धता, शांत वातावरण और श्रद्धा को महत्व दिया जाता है। गुरुवार की सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें, पूजा स्थान साफ करें और बृहस्पति देव का चित्र या प्रतीक सामने रखें। पीले फूल, हल्दी, चने की दाल, गुड़ या केला जैसी वस्तुएँ परंपरा के अनुसार अर्पित की जा सकती हैं।
इसके बाद दीपक जलाकर बृहस्पति देव का ध्यान करें और अपनी मनोकामना के साथ-साथ ज्ञान, सद्बुद्धि तथा सही मार्ग की प्रार्थना करें। फिर अपनी परंपरा में प्रचलित बृहस्पति चालीसा का पाठ करें। पाठ के बाद आरती या बृहस्पति मंत्र का जाप किया जा सकता है। अंत में प्रसाद ग्रहण करें और यदि संभव हो तो जरूरतमंद व्यक्ति को पीली वस्तु या भोजन का दान करें।
सामग्री की लंबी सूची बनाना आवश्यक नहीं है। सामान्य रूप से बृहस्पति पूजा में पीले फूल, हल्दी, अक्षत, दीपक, चने की दाल, गुड़, केला और पीली मिठाई जैसी वस्तुओं का प्रयोग कई परंपराओं में मिलता है। कुछ स्रोत पीले वस्त्र और पीले आसन को भी शुभ मानते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण सामग्री फिर भी श्रद्धा और नियमितता है। यदि किसी दिन सभी पूजा सामग्री उपलब्ध न हो, तो केवल दीपक जलाकर शांत मन से प्रार्थना और चालीसा का पाठ करना भी आपकी व्यक्तिगत भक्ति का हिस्सा हो सकता है। पूजा को इतना कठिन नहीं बनाना चाहिए कि सामग्री जुटाने के कारण नियमितता ही टूट जाए।
सुबह स्नान के बाद शांत स्थान चुनना अच्छा माना जाता है। यदि सुबह संभव नहीं है, तो दिन में किसी अन्य शांत समय पर भी श्रद्धा से पाठ किया जा सकता है। पाठ के दौरान शब्दों को स्पष्ट रूप से पढ़ें और यथासंभव अर्थ को समझने का प्रयास करें। धार्मिक स्रोत गुरुवार को बृहस्पति उपासना के लिए विशेष दिन बताते हैं।
पाठ करते समय मोबाइल फोन को साइलेंट करना एक छोटा लेकिन उपयोगी अभ्यास हो सकता है। चालीसा को जल्दी-जल्दी समाप्त करने के बजाय प्रत्येक चौपाई के भाव पर ध्यान दें। अंत में कुछ मिनट शांत बैठकर सोचें कि आज आप अपने जीवन में कौन-सा एक सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। यही छोटा अभ्यास धार्मिक पाठ को केवल पढ़ने की गतिविधि से निकालकर जीवन-व्यवहार से जोड़ देता है।
बृहस्पति चालीसा के साथ बृहस्पति मंत्र का जाप भी कई परंपराओं में किया जाता है। एक प्रसिद्ध मंत्र है:
“देवानां च ऋषीणां च गुरुं काञ्चनसन्निभम्। बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्॥”
इसका भाव यह है कि देवताओं और ऋषियों के गुरु, स्वर्ण के समान तेजस्वी तथा बुद्धि के स्वरूप बृहस्पति को प्रणाम किया जाता है। बृहस्पति चालीसा विस्तृत स्तुति का रूप लेती है, जबकि मंत्र छोटा होने के कारण दैनिक जप में आसानी से शामिल किया जा सकता है।
बृहस्पति चालीसा का पाठ करते समय सबसे पहले उच्चारण और श्रद्धा पर ध्यान दें। यदि किसी पंक्ति का अर्थ स्पष्ट नहीं है, तो उसे समझने की कोशिश करें।
दूसरी बात, धार्मिक दावों को लेकर संतुलित दृष्टिकोण रखें। चालीसा को पढ़ना आध्यात्मिक साधना हो सकता है, लेकिन इसे बीमारी का चिकित्सकीय इलाज, आर्थिक निवेश की गारंटी या परीक्षा परिणाम सुनिश्चित करने का साधन नहीं मानना चाहिए। धार्मिक विश्वास के साथ व्यावहारिक प्रयास चलते रहें। यही दृष्टिकोण भक्ति को जीवन से जोड़ता है।
बृहस्पति चालीसा का सबसे गहरा अर्थ गुरु की खोज में दिखाई देता है। मनुष्य के सामने रोज असंख्य विकल्प आते हैं—किस बात पर विश्वास करें, कौन-सा निर्णय लें, किस व्यक्ति की सलाह मानें और किस रास्ते पर चलें। ज्ञान के बिना विकल्पों की भीड़ कभी-कभी जंगल जैसी लग सकती है। गुरु का प्रतीक उस दिशा-सूचक की तरह है जो व्यक्ति को रास्ता पहचानने में मदद करता है।
गुरु-तत्व का अर्थ केवल किसी व्यक्ति को गुरु मानना नहीं है। यह उस चेतना का भी प्रतीक है जो हमें सीखने, प्रश्न पूछने और अपनी गलतियों से सुधार करने के लिए तैयार करती है। बृहस्पति की उपासना इसी कारण केवल धन या भाग्य की इच्छा तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यदि चालीसा पढ़ने के बाद व्यक्ति थोड़ा अधिक विनम्र, थोड़ा अधिक विवेकशील और थोड़ा अधिक जिम्मेदार बनता है, तो यह साधना के आध्यात्मिक उद्देश्य के काफी करीब है।
विद्यार्थियों के लिए गुरुवार की एक सरल दिनचर्या बनाई जा सकती है। सुबह या शाम बृहस्पति चालीसा का पाठ करें, फिर उस सप्ताह पढ़े गए विषयों की समीक्षा करें और अगले सप्ताह का अध्ययन लक्ष्य तय करें। परीक्षा की सफलता के लिए चालीसा के साथ नियमित अभ्यास, प्रश्नपत्र हल करना, समय-प्रबंधन और कमजोर विषयों पर अतिरिक्त मेहनत आवश्यक है।
बृहस्पति को ज्ञान का प्रतीक मानने का सबसे अच्छा तरीका शायद यही है कि विद्यार्थी ज्ञान को व्यवहार में उतारे। किसी विषय को रटने के बजाय उसका अर्थ समझना, शिक्षक के प्रश्न पूछना, गलत उत्तरों से सीखना और दूसरों की सहायता करना गुरु-तत्व की वास्तविक अभिव्यक्ति हो सकती है।
ज्योतिषीय मान्यताओं में कुंडली में बृहस्पति की स्थिति को महत्वपूर्ण माना जाता है और प्रतिकूल स्थिति को कभी-कभी गुरु दोष या कमजोर गुरु के रूप में देखा जाता है। ऐसे मामलों में लोग गुरुवार को चालीसा पाठ, व्रत, दान और मंत्र-जप जैसे उपाय करते हैं।
यदि कोई व्यक्ति इस प्रकार का उपाय करना चाहता है, तो अपनी पूरी कुंडली और परिस्थितियों के आधार पर योग्य विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित है।
गुरुवार को पीली वस्तुओं का दान बृहस्पति उपासना की लोकप्रिय परंपराओं में से एक है। चने की दाल, पीले अन्न, गुड़, केला या पीली मिठाई जैसी वस्तुओं का दान कई स्रोतों में बताया गया है।
व्रत रखने वाले व्यक्ति अपनी स्वास्थ्य स्थिति और व्यक्तिगत आवश्यकताओं को ध्यान में रखें। किसी भी प्रकार का कठोर उपवास स्वास्थ्य समस्या वाले व्यक्ति के लिए उचित नहीं हो सकता। धार्मिक आस्था का उद्देश्य शरीर को नुकसान पहुँचाना नहीं, बल्कि अनुशासन और श्रद्धा विकसित करना है। इसलिए अपनी परिस्थिति के अनुसार सरल और सुरक्षित साधना अपनाना बेहतर है।
गुरुवार को इसका पाठ विशेष रूप से प्रचलित है, लेकिन श्रद्धालु अपनी व्यक्तिगत साधना के अनुसार अन्य दिनों में भी पाठ कर सकते हैं। गुरुवार का महत्व बृहस्पति देव से जुड़ी धार्मिक परंपरा के कारण है।
इसके लिए सभी लोगों पर लागू कोई एक अनिवार्य संख्या नहीं है। एक बार श्रद्धा से पाठ करना भी पर्याप्त हो सकता है। नियमित साधना करना चाहते हैं तो हर गुरुवार एक निश्चित समय तय करना सरल और व्यावहारिक तरीका है।
हाँ, विद्यार्थी इसे ज्ञान और सद्बुद्धि की प्रार्थना के रूप में पढ़ सकते हैं। हालांकि परीक्षा की सफलता के लिए नियमित अध्ययन और अभ्यास आवश्यक हैं।
धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं में बृहस्पति को विवाह से संबंधित शुभता से जोड़ा जाता है और कुछ स्रोत विवाह में देरी की स्थिति में इसका पाठ सुझाते हैं। लेकिन इसे विवाह की गारंटी के रूप में नहीं समझना चाहिए।
ज्योतिषीय परंपरा में ऐसा माना जाता है कि बृहस्पति की उपासना, मंत्र-जाप और चालीसा पाठ गुरु ग्रह से जुड़े सकारात्मक प्रभावों के लिए किए जा सकते हैं। यह धार्मिक-ज्योतिषीय मान्यता है, वैज्ञानिक रूप से स्थापित तथ्य नहीं।
अगर आप बृहस्पति चालीसा को अपनी साप्ताहिक दिनचर्या में शामिल करना चाहते हैं, तो इसे बहुत जटिल बनाने की जरूरत नहीं है। गुरुवार को स्नान करके पूजा स्थान साफ करें, दीपक जलाएँ, बृहस्पति देव का ध्यान करें और चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ करें। इसके बाद बृहस्पति मंत्र का जाप, आरती और अपनी क्षमता के अनुसार दान किया जा सकता है। धार्मिक स्रोतों में गुरुवार को पीले वस्त्र तथा पीली वस्तुओं के प्रयोग की परंपरा भी बताई गई है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पाठ को केवल इच्छा पूरी करने का माध्यम न बनाएं। हर गुरुवार एक छोटा संकल्प लें—इस सप्ताह किसी से कठोर शब्द नहीं बोलना है, किसी जरूरतमंद की सहायता करनी है, पढ़ाई में ईमानदारी रखनी है, किसी अनुभवी व्यक्ति से सीखना है या अपनी कोई गलत आदत सुधारनी है। ऐसा करने पर बृहस्पति चालीसा का गुरु-तत्व रोजमर्रा के जीवन में उतरने लगता है। यही किसी भी आध्यात्मिक अभ्यास की सबसे सुंदर परिणति है।
बृहस्पति चालीसा देवगुरु बृहस्पति की भक्ति, ज्ञान, विवेक और सही मार्ग की प्रार्थना से जुड़ा लोकप्रिय धार्मिक पाठ है। गुरुवार को इसका पाठ करने की परंपरा व्यापक है और धार्मिक मान्यताओं में इसे शिक्षा, बुद्धि, धर्म, समृद्धि, विवाह तथा गुरु ग्रह से संबंधित शुभता के लिए पढ़ा जाता है।
इस साधना का वास्तविक मूल्य केवल किसी चमत्कार की अपेक्षा में नहीं, बल्कि उसके संदेश को जीवन में अपनाने में भी देखा जा सकता है। यदि बृहस्पति ज्ञान के प्रतीक हैं, तो उनकी उपासना हमें सीखने की आदत विकसित करने की प्रेरणा देती है; यदि वे गुरु हैं, तो हमें अच्छे मार्गदर्शन का सम्मान करना चाहिए; और यदि वे धर्म तथा विवेक से जुड़े हैं, तो हमें अपने निर्णयों में नैतिकता और समझ को स्थान देना चाहिए। इसलिए गुरुवार को बृहस्पति चालीसा पढ़ते समय केवल एक मनोकामना न माँगें—बुद्धि, धैर्य, सही निर्णय और अपने कर्मों को बेहतर बनाने की शक्ति भी माँगें।
ध्यान रखें कि बृहस्पति चालीसा के ऑनलाइन उपलब्ध पाठों में संस्करणगत अंतर हो सकता है। इसलिए नियमित पाठ के लिए किसी विश्वसनीय धार्मिक ग्रंथ या परंपरा में प्रचलित पाठ को प्राथमिकता देना उचित है।
1. क्या बृहस्पति चालीसा पढ़ने के लिए पीले कपड़े पहनना जरूरी है?
पीले वस्त्र पहनना कई परंपराओं में शुभ माना जाता है, लेकिन इसे अनिवार्य शर्त नहीं समझना चाहिए। श्रद्धा, स्वच्छता और नियमितता अधिक महत्वपूर्ण हैं।
2. क्या बृहस्पति चालीसा रात में पढ़ी जा सकती है?
गुरुवार को शांत मन से पाठ करना मुख्य बात है। यदि सुबह संभव न हो तो अपनी सुविधा के अनुसार दिन में या शाम को पाठ किया जा सकता है।
3. क्या चालीसा पढ़ने के साथ दान करना जरूरी है?
दान धार्मिक परंपराओं में शुभ माना जाता है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है। अपनी क्षमता के अनुसार भोजन, पीली वस्तु या किसी जरूरतमंद की सहायता करना सेवा की भावना को व्यक्त कर सकता है।
4. बृहस्पति चालीसा और बृहस्पति मंत्र में क्या अंतर है?
चालीसा विस्तृत स्तुति का रूप है, जबकि मंत्र अपेक्षाकृत संक्षिप्त जप है। दोनों का उद्देश्य धार्मिक साधना और बृहस्पति देव का स्मरण करना है।
5. क्या केवल बृहस्पति चालीसा पढ़ने से जीवन की सभी समस्याएँ समाप्त हो जाती हैं?
ऐसी गारंटी देना उचित नहीं है। धार्मिक दृष्टि से पाठ को आस्था और शुभ साधना माना जाता है, जबकि वास्तविक जीवन की समस्याओं के समाधान के लिए उचित कर्म, योजना, विशेषज्ञ सलाह और परिस्थितियों के अनुसार व्यावहारिक कदम भी जरूरी हैं।
बृहस्पति देव को हिंदू धार्मिक परंपरा में देवताओं के गुरु के रूप में सम्मान दिया जाता है। उन्हें ज्ञान, बुद्धि, धर्म, सदाचार और उचित मार्गदर्शन का प्रतीक माना जाता है। गुरुवार के दिन बृहस्पति देव की पूजा और चालीसा पाठ करने की परंपरा अनेक भक्तों में प्रचलित है।
आपके दिए हुए चालीसा-पाठ का मुख्य भाव यह है कि भक्त देवगुरु बृहस्पति से ज्ञान, सद्बुद्धि, आध्यात्मिक उन्नति, संकटों से रक्षा और जीवन में सही मार्ग प्राप्त करने की प्रार्थना करता है।
चालीसा का प्रारंभ गणपति और माता शारदा के स्मरण से होता है। इसका भाव यह है कि भक्त सबसे पहले विघ्नों को दूर करने वाले गणेश तथा ज्ञान की देवी सरस्वती से कृपा की प्रार्थना करता है, ताकि उसकी बुद्धि निर्मल हो और वह गुरु की महिमा को समझ सके।
चालीसा के प्रारंभिक भाग में बृहस्पति देव को भक्तों का हित करने वाले और देवताओं, मनुष्यों तथा ऋषि-मुनियों के कल्याणकारी गुरु के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उन्हें वाचस्पति, देवगुरु और पुरोहित जैसे नामों से संबोधित किया जाता है। उनके स्वरूप में स्वर्णिम आभा, पीत वस्त्र, मुकुट तथा दिव्य वाहन जैसे प्रतीकों का वर्णन मिलता है।
यह वर्णन केवल बाहरी रूप का चित्रण नहीं है। पीला रंग और स्वर्णिम आभा पारंपरिक रूप से ज्ञान, शुभता और आध्यात्मिक प्रकाश से जोड़े जाते हैं। इसलिए बृहस्पति का स्वरूप व्यक्ति को अज्ञान से ज्ञान की ओर जाने का प्रतीकात्मक संदेश देता है।
आगे चालीसा में बृहस्पति को अत्यंत ज्ञानी, सर्वज्ञ और धर्म के स्वरूप के रूप में स्मरण किया गया है। भक्त उनसे ऐसी बुद्धि और विवेक की प्रार्थना करता है जिसके माध्यम से जीवन के कठिन निर्णय सही तरीके से लिए जा सकें।
यहाँ गुरु तत्व का विशेष महत्व है। गुरु केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह यह समझने में सहायता करता है कि ज्ञान का सही उपयोग किस प्रकार किया जाए। इसी कारण बृहस्पति की उपासना को शिक्षा और सद्बुद्धि से जोड़ा जाता है।
चालीसा के अगले प्रसंग में बृहस्पति की कठोर तपस्या और भगवान शिव की प्रसन्नता का उल्लेख मिलता है। इसका आध्यात्मिक संदेश यह है कि निष्ठा, तप, धैर्य और साधना के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन में उच्च उद्देश्य प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
इस प्रसंग को केवल पौराणिक घटना के रूप में पढ़ने के बजाय जीवन के लिए प्रेरणा के रूप में भी देखा जा सकता है। किसी भी बड़ी उपलब्धि के पीछे निरंतर अभ्यास और धैर्य की आवश्यकता होती है।
बृहस्पति को देवगुरु कहा जाता है। चालीसा में उनके उस स्वरूप का वर्णन मिलता है जिसमें वे देवताओं को मार्गदर्शन देते हैं और विपरीत परिस्थितियों में उनका सहयोग करते हैं।
यह भाव बताता है कि कठिन समय में सही सलाह कितनी महत्वपूर्ण होती है। शक्ति होने के बावजूद यदि दिशा का अभाव हो तो व्यक्ति गलत निर्णय ले सकता है। इसलिए गुरु का स्थान भारतीय परंपरा में अत्यंत सम्मानित माना गया है।
चालीसा में बृहस्पति को विद्या और बुद्धि से जोड़ते हुए उनकी कृपा की प्रार्थना की गई है। भक्त चाहता है कि उसके भीतर अज्ञान कम हो और ज्ञान का प्रकाश बढ़े।
विद्यार्थियों के लिए इसका भाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। परीक्षा में सफलता केवल धार्मिक पाठ पर निर्भर नहीं करती, लेकिन चालीसा का पाठ मन को एकाग्र करने और सकारात्मक संकल्प लेने का अवसर दे सकता है। इसके साथ नियमित अध्ययन, अभ्यास और अनुशासन आवश्यक हैं।
बृहस्पति की पूजा में पीला रंग विशेष रूप से लोकप्रिय है। पीले वस्त्र, पीले फूल, चने की दाल, हल्दी और पीले खाद्य पदार्थों का प्रयोग कई पारंपरिक पूजा-पद्धतियों में मिलता है।
ज्योतिषीय परंपरा में भी बृहस्पति को पीले रंग से जोड़ा जाता है। इसी कारण गुरुवार की पूजा में पीली वस्तुओं का उपयोग और दान करने की मान्यता मिलती है।
हालाँकि पूजा सामग्री की उपलब्धता को लेकर बहुत अधिक चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। भक्ति का मूल आधार श्रद्धा, स्वच्छता और सकारात्मक भावना है।
गुरुवार को बृहस्पति देव की पूजा का विशेष दिन माना जाता है। भक्त सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और पूजा स्थान पर दीपक जलाकर बृहस्पति देव का ध्यान करते हैं।
इसके बाद चालीसा का पाठ किया जा सकता है। कुछ लोग इसके साथ बृहस्पति मंत्र का जाप और आरती भी करते हैं।
यदि आप इसे नियमित साधना बनाना चाहते हैं तो हर गुरुवार एक निश्चित समय निर्धारित करना उपयोगी रहेगा। नियमितता किसी भी आध्यात्मिक अभ्यास को अधिक व्यवस्थित बना देती है।
गुरुवार को पूजा के लिए सबसे पहले पूजा स्थान को स्वच्छ करें। बृहस्पति देव या भगवान विष्णु का चित्र स्थापित करके दीपक जलाएँ। परंपरा के अनुसार पीले फूल, हल्दी, चने की दाल, गुड़ या केले जैसी वस्तुएँ अर्पित की जा सकती हैं।
इसके बाद शांत मन से बृहस्पति देव का ध्यान करें और चालीसा का पाठ करें। पाठ समाप्त होने के बाद अपनी मनोकामना के साथ ज्ञान, सद्बुद्धि और सही मार्गदर्शन की प्रार्थना करना विशेष रूप से सार्थक माना जा सकता है।
अंत में आरती करके प्रसाद ग्रहण करें। अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन या अन्य उपयोगी वस्तु का दान भी किया जा सकता है।
बृहस्पति उपासना में प्रचलित एक मंत्र है:
ॐ बृं बृहस्पतये नमः॥
एक प्रसिद्ध ध्यान मंत्र भी बृहस्पति देव को समर्पित है:
देवानां च ऋषीणां च गुरुं काञ्चनसन्निभम्।
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्॥
मंत्र का भाव यह है कि देवताओं और ऋषियों के गुरु तथा बुद्धि के स्वरूप बृहस्पति को श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया जाए।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बृहस्पति चालीसा का पाठ ज्ञान, विवेक, शिक्षा, धर्म, समृद्धि और गुरु-कृपा के लिए किया जाता है। कुछ ज्योतिषीय परंपराएँ इसे गुरु ग्रह से संबंधित सकारात्मक परिणामों के लिए किए जाने वाले उपायों में भी शामिल करती हैं।
इन लाभों को आस्था और धार्मिक मान्यता के रूप में समझना चाहिए। इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित परिणाम या किसी समस्या के निश्चित समाधान के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।
विद्यार्थी इसे एकाग्रता और सद्बुद्धि की प्रार्थना के रूप में पढ़ सकते हैं। इसके बाद पढ़ाई के लिए निश्चित समय निर्धारित करना और कठिन विषयों का अभ्यास करना अधिक उपयोगी रहेगा।
करियर में गुरु तत्व का अर्थ सही मार्गदर्शन और निरंतर सीखने से भी लगाया जा सकता है। गुरुवार को चालीसा पाठ के साथ अपने कौशल और अगले सप्ताह के लक्ष्यों की समीक्षा करना एक अच्छा अभ्यास हो सकता है।
बृहस्पति को पारंपरिक रूप से समृद्धि से भी जोड़ा जाता है। लेकिन आर्थिक सफलता के लिए धार्मिक साधना के साथ बचत, निवेश की समझ, आय बढ़ाने की योजना और खर्च पर नियंत्रण भी जरूरी हैं।
ज्योतिषीय परंपरा में बृहस्पति को विवाह और पारिवारिक जीवन से संबंधित महत्वपूर्ण ग्रह माना जाता है। इसी वजह से विवाह में देरी या वैवाहिक जीवन से जुड़ी चिंताओं के दौरान कुछ लोग गुरुवार को बृहस्पति पूजा और चालीसा पाठ करते हैं।
इसे धार्मिक विश्वास के रूप में लेना उचित है। विवाह के वास्तविक जीवन में आपसी समझ, संवाद, सम्मान और अनुकूलता की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति की स्थिति को विशेष महत्व दिया जाता है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में गुरु को कमजोर या प्रतिकूल माना जाता है, तो ज्योतिषीय परंपरा में बृहस्पति मंत्र, पूजा, दान, व्रत और चालीसा पाठ जैसे उपाय बताए जाते हैं।
लेकिन किसी भी व्यक्ति की कुंडली के संबंध में व्यक्तिगत निर्णय लेने से पहले योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।
गुरुवार को पीली वस्तुओं का दान करने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है। चने की दाल, हल्दी, पीले फल, भोजन या जरूरतमंद व्यक्ति के लिए उपयोगी सामग्री दान की जा सकती है।
दान का सबसे सुंदर अर्थ यही है कि जो हमारे पास उपलब्ध है, उसमें से किसी जरूरतमंद के साथ कुछ साझा किया जाए। इसलिए दान को केवल ग्रह संबंधी उपाय के रूप में न देखकर सेवा और करुणा की भावना से करना अधिक सार्थक है।
पूरे पाठ का सबसे महत्वपूर्ण संदेश गुरु और ज्ञान की महत्ता है। मनुष्य चाहे कितना भी बुद्धिमान क्यों न हो, जीवन में ऐसे अवसर आते हैं जब उसे किसी अनुभवी व्यक्ति की सलाह की आवश्यकता होती है।
बृहस्पति देव का गुरु स्वरूप हमें यह याद दिलाता है कि ज्ञान के साथ विनम्रता भी आवश्यक है। जिस प्रकार दीपक स्वयं प्रकाश देता है और दूसरे रास्ते को भी रोशन करता है, उसी प्रकार सच्चा ज्ञान व्यक्ति के साथ-साथ उसके आसपास के लोगों के जीवन में भी सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
चालीसा के बाद बृहस्पति देव की आरती करने की परंपरा भी मिलती है। आरती में बृहस्पति देव को परमेश्वर, गुरु और ज्ञान के स्वरूप के रूप में स्मरण करते हुए उनकी सेवा और कृपा की प्रार्थना की जाती है।
आरती का मूल भाव यह है कि भक्त अपने जीवन में गुरु के प्रकाश को स्वीकार करे और अज्ञान, भय तथा मोह से मुक्त होने की प्रार्थना करे।

॥ श्री गुरु बृहस्पति देव चालीसा ॥
॥ दोहा ॥
गाउे नित मंगलाचरण, गणपति मेरे नाथ ।
करो कृपा माँ शारदा, जीव रहें मेरे साथ ॥
वीर देव भक्तन हितकारी ।
सुर नर मुनिजन के उद्धारी ।
वाचस्पति सुर गुरू पुरोहित ।
कमलासन बृहस्पति विराजित ॥
स्वर्ण दंड वर मुद्रा धारी ।
पात्र माल शोभित भुज चारी ।
है स्वर्णिम आवास तुम्हारा ।
पीत वदन देवों में न्यारा ॥
स्वर्णारथ प्रभु अति ही सुखकर ।
पाण्डुर वर्ण अश्व चले जुतकर ।
स्वर्ण मुकुट पीताम्बर धारी ।
अंगिरा नन्दन गगन विहारी ॥
अज अगम्य अविनाशी स्वामी ।
अनन्त वरिष्ठ सर्वज्ञ नामी ।
श्रीमत् धर्म रूप धन दाता ।
शरणागत सर्वापद् त्राता ॥
पुष्य नाथ ब्रह्म विद्या विशारद ।
गुण बरने सुर गण मुनि नारद ।
कठिन तप प्रभास में कीन्हा ।
शंकर प्रसन्न हो वर दीन्हा ॥
देव गुरू ग्रह पति कहाओ ।
निर्मल मति वाचस्पति पाओ ।
असुर बने सुर यज्ञ विनाशक ।
करें सुरक्षित मन्त्र से सुर मख ॥
बनकर देवों के उपकारी ।
दैत्य विनाशे विघ्न निवारी ।
बृहस्पति धनु मीन के नायक ।
लोक द्विज नय बुद्धि प्रदायक ॥
मावस वीर वार ब्रत धारे ।
आश्रय दें सर्व पाप निवारें ।
पीताम्बर हल्दी पीला अन्न ।
शक्कर मधु पुखराज भू-लवण ॥
पुस्तक स्वर्ण अश्व दान कर ।
ददेवें जीव अनेक सुखद वर ।
विद्या सिन्धु स्वयं कहलाते ।
भक्तों को सन्मार्ग चलाते ॥
इन्द्र किया अपमान अकारण ।
विश्वरूपा गुरू किये धारण ।
बढ़ा कष्ट सब राज गँवाया ।
दानव ध्वज स्वर्ग लहराया ॥
क्षमा माँग फिर स्तुति कीन्ही ।
विपदा सकल जीव हर लीन्ही ।
बढ़ा देवों में मान तुम्हारा ।
कीरति गावें सकल संसारा ॥
दोष बिसार शरण में लीजै ।
उर आनन्द प्रभु भर दीजै ।
सदगुरू तेरी प्रबल माया ।
तेरा पारा ना कोई पाया ॥
सब तीर्थ गुरू चरण समाये ।
समझे विरला बहु सुख पाये ।
अमृत वारिद सदृश वाणी ।
हिरदय धार भए ब्रह्ज्ञानी ॥
शोभा मुख से बरनि न जाईं ।
देवें भक्ति जीव मनचाही ।
जो अनाथ ना कोइ सहाई ।
लख चोरासी पार कराहीं ॥
प्रथम गुरू का पूजन कीजे ।
गुरू चरणामृत रुच-रुच पीजै ।
मृग तृष्णा गुरू दरशन राखी ।
मिले मुक्ति हो सब जग साखी ॥
चरणन रज सतूगुरु सिर धारे ।
पा गए दास पदारथ सारे ।
जग के कार विहारण दोड़े ।
गुरू मोह के बन्धन तोड़े ॥
पारस माणिक नीलम रत्ना ।
गुरूवर सम्मुख व्यर्थ कल्पना ।
कर निष्काम भक्ति गुरुवर की ।
सुन्दर छवि धारे सुखकर की ॥
गुरू पताका जो फहारायें ।
मन क्रम वचन ध्यान से ध्यायें ।
काल रूप यम नहीं सतावें ।
निश्चय गुरुवर पिंड छुड़ावें ॥
भूत पिशाच्र निकट ना आवें ।
रोगी रोग मुक्त हो जावें ।
संतती हीन संस्तुति गावें ।
मंगल होय पुत्र धन पावें ॥
“मनु! गुण गाहिरदय हर्षावे ।
स्नेह जीव चरणों में लावे ।
जीव चालीसा पढ़े पढ़ावे ।
पूर्ण शांति को पल में पावें ॥
मात पिता के संग मनु, गुरू चरण में लीन ।
किरपा सब पर कीजिये, जान जगत में दीन ॥
॥ इति श्री बृहस्पति चालीसा ॥
ओम जय बृहस्पति देवा स्वामी जय बृहस्पति देवा,
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओं तुम संतन की सेवा ॥
ओंम… ॥
पारब्रम्ह परमेश्वर तुम मेरे स्वामी ।
ज्ञान जानू ध्यान जानू नित्य करत सेवा ॥
ओम… ॥
तुम बिन और दूजा आस करूँ किस की ।
ब्रम्हा विष्णु सदाशिव गुरू व्रत धारी ॥
ओंम… ॥
गुरूबिन ध्यान न होवे कोटि जतन कीजै स्वामी ।
जय मोह विनाषक भय बन्धन हारी ॥
ओंम… ।
पारब्रम्ह परमेश्वर तुम सबके प्राणपति स्वामी ।
बेद पुराण बखानत गुरू महिमा भारी ॥
ओंम… ।
बृहस्पति जी की आरती जो कोई गावे स्वामी ।
दर्शन पावे जो कोई सन्त करे सेवा ॥
ओम जय बृहस्पति स्वामी ॥
॥ श्री बृहस्पति महाराज की जय ॥
ॐ श्रीगुरुवे नमः ॥
श्री बृहस्पति चालीसा व आरती समाप्त॥