
Table of Contents
गुरुचरित्र अध्याय 18 दत्त संप्रदाय की लोकप्रिय आध्यात्मिक परंपरा में विशेष स्थान रखने वाला अध्याय माना जाता है। भक्तों के बीच इसे अक्सर दारिद्र्य निवारण, आर्थिक संकट से राहत और गुरु-कृपा से जोड़कर देखा जाता है। उपलब्ध गुरुचरित्र पाठ-स्रोतों के अनुसार इस अध्याय का मूल प्रसंग अमरापुर की महिमा, पंचगंगा और कृष्णा नदी के संगम, औदुंबर वृक्ष तथा एक अत्यंत गरीब ब्राह्मण परिवार से संबंधित है। कथा में श्रीगुरु नृसिंह सरस्वती एक गरीब ब्राह्मण के घर भिक्षा स्वीकार करते हैं और उसके जीवन में ऐसा परिवर्तन आता है जिसे भक्त गुरु-कृपा का उदाहरण मानते हैं।
यह अध्याय केवल धन प्राप्त करने की कहानी समझकर पढ़ना इसके वास्तविक संदेश को छोटा कर देना होगा। इसकी गहराई उस भावना में है जिसमें एक निर्धन परिवार अपनी परिस्थितियों के बावजूद अतिथि और गुरु के प्रति श्रद्धा बनाए रखता है। श्रीगुरु उस परिवार के घर उपलब्ध साधारण भोजन को स्वीकार करते हैं और फिर ऐसी लीला करते हैं जिसका अर्थ केवल बाहरी संपत्ति से नहीं, बल्कि अहंकार, आसक्ति, अभाव की मानसिकता और गुरु पर विश्वास से भी जोड़ा जा सकता है। इसलिए आज जब लोग आर्थिक तनाव, नौकरी की चिंता, व्यापार में अस्थिरता या कर्ज जैसी समस्याओं से गुजरते हैं, तब अध्याय 18 उन्हें केवल चमत्कार की उम्मीद नहीं, बल्कि धैर्य, श्रद्धा और सकारात्मक जीवन-दृष्टि का संदेश भी दे सकता है।
श्री गुरुचरित्र की परंपरा में अध्याय 18 को “अमरापुर महिमा” और “द्विज दैन्य हरण” से संबंधित अध्याय के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। मूल ओवीबद्ध पाठ में शुरुआत सिद्धमुनि और नामधारक के संवाद से होती है, जहाँ गुरुचरित्र की कथा को अमृत के समान बताया गया है और गुरु के चरणों में मन लगाने की भावना व्यक्त की जाती है। इसके बाद कथा अमरापुर की ओर बढ़ती है, जहाँ पवित्र संगम और श्रीगुरु की उपस्थिति का वर्णन मिलता है। उपलब्ध पाठों में अमरापुर को विशेष तीर्थभाव वाला स्थान बताया गया है और पंचगंगा के कृष्णा नदी से मिलने का प्रसंग प्रमुखता से आता है।
अध्याय का केंद्रीय भाव तब और स्पष्ट होता है जब श्रीगुरु एक गरीब ब्राह्मण के घर भिक्षा के लिए जाते हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर बताई गई है कि घर में भोजन के लिए बहुत सीमित साधन उपलब्ध हैं, फिर भी ब्राह्मण परिवार अपनी क्षमता के अनुसार गुरु का स्वागत करता है। यही बिंदु पूरी कथा को साधारण आर्थिक कहानी से आध्यात्मिक कथा में बदल देता है। यहाँ संदेश यह दिखाई देता है कि भक्ति की कीमत वस्तु की कीमत से नहीं मापी जाती। किसी व्यक्ति के पास महंगे पकवान हों या केवल साधारण सब्जी, यदि उसके भीतर श्रद्धा, सेवा और समर्पण है तो वही भाव गुरुचरित्र की दृष्टि से महत्वपूर्ण बन जाता है।
गुरुचरित्र अध्याय 18 का मुख्य विषय गुरु-कृपा और दारिद्र्य से जुड़े प्रसंग के माध्यम से आध्यात्मिक परिवर्तन को समझाना है। इंटरनेट पर उपलब्ध कई धार्मिक व्याख्याएँ इसे धन, समृद्धि, आर्थिक परेशानी, कर्ज और व्यवसाय संबंधी समस्याओं से जोड़ती हैं, लेकिन मूल कथा को ध्यान से देखें तो गुरु का संदेश केवल “धन प्राप्त करो” तक सीमित नहीं है। कथा में पहले अमरापुर की पवित्रता का वर्णन आता है, फिर श्रीगुरु की भिक्षा और गरीब परिवार का प्रसंग आता है, जिससे यह समझने का अवसर मिलता है कि गुरु के लिए भक्त की भावना सबसे महत्वपूर्ण है। कुछ आधुनिक धार्मिक लेख इस अध्याय को विशेष रूप से आर्थिक संकटों में पाठ करने योग्य बताते हैं।
इसलिए यदि कोई व्यक्ति अध्याय 18 पढ़ रहा है तो उसके सामने दो स्तर होने चाहिए। पहला स्तर है उसकी धार्मिक श्रद्धा—वह श्रीगुरु नृसिंह सरस्वती को दत्तात्रेय परंपरा में सद्गुरु मानकर उनकी कथा का श्रवण और पाठ करता है। दूसरा स्तर है कथा का व्यावहारिक संदेश—कठिन समय में निराश न होना, अपनी क्षमता के अनुसार धर्म और सेवा करना, अतिथि का सम्मान करना, लोभ से बचना और जीवन में मिलने वाली छोटी चीजों के लिए भी कृतज्ञ रहना। जब इन दोनों स्तरों को साथ समझा जाता है, तब अध्याय 18 केवल आर्थिक लाभ की इच्छा वाला पाठ नहीं रहता, बल्कि आस्था और आचरण का पाठ बन जाता है।
अध्याय 18 का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अमरापुर की महिमा है। मूल पाठ में पंचगंगा की विभिन्न धाराओं का वर्णन करते हुए उसे कृष्णा नदी के संगम से जोड़ा गया है और अमरापुर को अत्यंत मनोहर तथा पवित्र स्थान के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उपलब्ध पाठों में शिवा, भद्रा, भोगावती, कुंभी और सरस्वती नामों का उल्लेख पंचगंगा के संदर्भ में मिलता है। इसी प्रसंग में अमरापुर की तुलना प्रयाग के संगम से की गई है, जिससे कथा में इस स्थान की धार्मिक महत्ता को समझाने की कोशिश की गई है।
तीर्थ का वर्णन केवल भौगोलिक जानकारी देने के लिए नहीं है। भारतीय संत साहित्य में किसी पवित्र स्थान का वर्णन अक्सर साधक के मन को बाहरी यात्रा से भीतर की यात्रा की ओर ले जाने का माध्यम बनता है। नदी का संगम अलग-अलग धाराओं के एक होने का प्रतीक भी माना जा सकता है; उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में विचार, कर्म और श्रद्धा जब एक दिशा में आते हैं तो भीतर स्थिरता पैदा होती है। अध्याय 18 के इस हिस्से को इसी व्यापक दृष्टि से पढ़ना उपयोगी है। तब अमरापुर केवल एक स्थान नहीं, बल्कि गुरु की शरण में मन के एकाग्र होने का आध्यात्मिक प्रतीक भी बन जाता है।
अध्याय 18 में औदुंबर वृक्ष और अमरेश्वर का उल्लेख विशेष श्रद्धा के साथ आता है। मूल पाठ में औदुंबर को कल्पतरु के समान बताया गया है और अमरेश्वर की उपस्थिति को उस पवित्र संगम से जोड़ा गया है। चौसठ योगिनियों तथा शक्तितीर्थ का भी उल्लेख मिलता है, जिससे इस क्षेत्र की धार्मिक कल्पना और तीर्थ-महिमा का विस्तार दिखाई देता है।
दत्त परंपरा में औदुंबर वृक्ष का महत्व विशेष रूप से जाना जाता है, इसलिए अध्याय 18 में उसका आना भक्तों के लिए भावनात्मक रूप से महत्वपूर्ण है। यहाँ “कल्पतरु” का भाव केवल इच्छा पूरी होने की सामान्य धारणा तक सीमित नहीं होना चाहिए। एक साधक के लिए कल्पतरु का अर्थ ऐसा आश्रय भी हो सकता है जहाँ वह अपनी चिंता, भय और असमर्थता रखकर भीतर से मजबूत होने की प्रेरणा पाए। गुरु की कृपा को केवल वस्तु पाने का साधन मानने के बजाय जीवन को सही दिशा देने वाली शक्ति समझना अध्याय के आध्यात्मिक अर्थ को अधिक गहरा बनाता है।
अध्याय 18 में श्रीगुरु नृसिंह सरस्वती की अमरापुर में उपस्थिति कथा का महत्वपूर्ण आधार है। सिद्धमुनि द्वारा नामधारक को सुनाई जा रही कथा में पहले तीर्थ की महिमा आती है और फिर गुरु की लीला का वर्णन होता है। यह क्रम अपने आप में अर्थपूर्ण है, क्योंकि कथा पहले वातावरण तैयार करती है और उसके बाद उस वातावरण में घटने वाली गुरु-कृपा की घटना सामने आती है। उपलब्ध पाठों में श्रीगुरु के तीर्थों में रहने और अमरापुर के विशेष महत्व का विस्तार मिलता है।
श्रीगुरु का चरित्र इस कथा में ऐसे संत के रूप में सामने आता है जो भक्त के बाहरी साधनों को नहीं, उसकी आंतरिक भावना को देखते हैं। जब कोई गुरु किसी गरीब व्यक्ति के घर जाता है तो सामान्य सामाजिक दृष्टि से वहाँ मिलने वाली वस्तु शायद बहुत छोटी हो, लेकिन गुरुचरित्र उस छोटी वस्तु में छिपी श्रद्धा को बड़ा मानता है। यही कारण है कि अध्याय 18 की कथा आज भी लोगों को प्रभावित करती है। जीवन में कई बार हमारे पास देने के लिए बहुत कुछ नहीं होता, लेकिन सच्ची नीयत से किया गया छोटा-सा सेवा भाव भी संबंधों और मन दोनों को बदल सकता है।
अध्याय 18 का सबसे प्रसिद्ध प्रसंग एक गरीब ब्राह्मण परिवार का है। उपलब्ध पाठों में बताया गया है कि वह ब्राह्मण अत्यंत निर्धन था और भिक्षा के सहारे परिवार का पालन करता था। घर में पर्याप्त अनाज या भोजन नहीं था, इसलिए परिवार के लिए एक साधारण बेल या घेवड्याच्या शेंगों की सब्जी भी भोजन का महत्वपूर्ण साधन थी। ऐसी परिस्थिति में श्रीगुरु उसके घर भिक्षा के लिए पहुँचते हैं और परिवार अपनी सीमित क्षमता में उनका सत्कार करता है।
यह प्रसंग जितना सरल है, उतना ही गहरा भी है। कल्पना कीजिए कि आपके घर में खाने के लिए सीमित भोजन है और उसी समय कोई अतिथि आ जाए; ऐसे में मन के भीतर स्वाभाविक चिंता पैदा हो सकती है कि जो थोड़ा है, वह भी कम पड़ जाएगा। लेकिन कथा में ब्राह्मण परिवार गुरु को अपनी उपलब्ध सामग्री से भोजन देता है। यही अतिथि सेवा, श्रद्धा और त्याग कथा का भावनात्मक केंद्र बन जाता है। अध्याय 18 हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि समृद्धि का पहला रूप बैंक खाते में बढ़ती संख्या नहीं, बल्कि ऐसा हृदय है जो अभाव में भी किसी के साथ अपना हिस्सा बाँट सके।
इस कथा का सबसे प्रभावशाली पहलू यह है कि गरीब परिवार की श्रद्धा उसकी आर्थिक स्थिति से छोटी नहीं होती। सामान्यतः मनुष्य कठिन परिस्थितियों में सबसे पहले उम्मीद खोता है। जब लगातार समस्याएँ आती हैं तो मन में प्रश्न उठते हैं—मेरे साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है, मेरी मेहनत का परिणाम क्यों नहीं मिल रहा, आगे क्या होगा? गुरुचरित्र का यह प्रसंग ऐसे मन के सामने एक अलग रास्ता रखता है: अभाव के बीच भी विश्वास को जीवित रखना। यही विश्वास कथा में गुरु-कृपा के अनुभव का आधार बनता है।
यहाँ श्रद्धा का अर्थ निष्क्रिय बैठना नहीं है। गरीब ब्राह्मण भिक्षा के लिए जाता है, परिवार भोजन की व्यवस्था करता है और अपनी परिस्थिति में जीवन चलाने का प्रयास करता है। यानी कथा में कर्म और श्रद्धा दोनों साथ चलते हैं। आधुनिक जीवन के संदर्भ में भी यह संदेश उपयोगी है—यदि आर्थिक कठिनाई है तो प्रार्थना के साथ काम, कौशल, बचत, योजना और सही निर्णय भी जरूरी हैं। आध्यात्मिक पाठ मन को स्थिर कर सकता है; व्यावहारिक प्रयास उस स्थिर मन को दिशा देता है।
श्रीगुरु का गरीब ब्राह्मण के घर भिक्षा स्वीकार करना कथा का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। साधारण दृष्टि से देखें तो गुरु के सामने किसी बड़े या समृद्ध घर में भोजन प्राप्त करने के अवसर हो सकते थे, लेकिन कथा उन्हें उस परिवार तक ले जाती है जिसके पास स्वयं के लिए भी पर्याप्त साधन नहीं हैं। इसका आध्यात्मिक अर्थ यह निकाला जा सकता है कि गुरु उस व्यक्ति के घर जाते हैं जिसे समाज आर्थिक दृष्टि से कमजोर समझता है, लेकिन जिसके भीतर सेवा और श्रद्धा की संपत्ति मौजूद है।
इस प्रसंग में एक सुंदर उलटाव दिखाई देता है। जिसके पास भौतिक रूप से कुछ नहीं है, उसके पास देने के लिए सबसे मूल्यवान चीज भावना है। गुरु उस भावना को स्वीकार करते हैं। यही कारण है कि अध्याय 18 को पढ़ते समय केवल यह पूछना कि “मुझे कितना धन मिलेगा?” कथा की आध्यात्मिक गहराई को सीमित कर देता है। बेहतर प्रश्न यह है—क्या मेरे भीतर देने की भावना है, क्या मैं कठिन परिस्थिति में भी सही आचरण कर सकता हूँ, और क्या मैं गुरु के संदेश को अपने व्यवहार में उतार रहा हूँ?
अध्याय 18 की कथा में घर के आँगन में उपलब्ध घेवड्याच्या शेंगांची भाजी यानी घेवड़े की फलियों की सब्जी का प्रसंग आता है। विभिन्न पाठ-स्रोतों में यह बताया गया है कि गरीब परिवार के लिए यह साधारण भोजन महत्वपूर्ण था और श्रीगुरु ने उसी घर में भिक्षा स्वीकार की। इसके बाद गुरु उस बेल को उखाड़ देते हैं या हटाते हैं, जिससे परिवार के सामने अचानक यह प्रश्न पैदा होता है कि अब उनके पास भोजन का वह सहारा भी नहीं रहेगा।
यहीं कथा में एक गहरा प्रतीक छिपा हुआ दिखाई देता है। कभी-कभी मनुष्य किसी छोटी-सी व्यवस्था को अपनी पूरी सुरक्षा समझ लेता है। वह सोचता है कि यही नौकरी हमेशा रहेगी, यही व्यापार चलता रहेगा, यही स्रोत हमेशा आय देता रहेगा। लेकिन जीवन अचानक उस सहारे को हटा देता है और हमें अपनी वास्तविक क्षमता तथा विश्वास का सामना करना पड़ता है। कथा में गुरु द्वारा बेल हटाने को भक्त परंपरा आगे आने वाली समृद्धि के लिए पुराने सीमित सहारे को हटाने वाली लीला के रूप में देखती है। इसे शाब्दिक आर्थिक नियम मानने के बजाय आध्यात्मिक प्रतीक के रूप में समझना अधिक सार्थक है।
अध्याय 18 को दारिद्र्य निवारण से जोड़ने का प्रमुख कारण यही गरीब ब्राह्मण की कथा है। आधुनिक धार्मिक व्याख्याओं में इसे आर्थिक संकट, धनवृद्धि और समृद्धि के लिए प्रभावी अध्याय बताया जाता है। कुछ स्रोत स्पष्ट रूप से कहते हैं कि अध्याय 18 का पाठ आर्थिक समस्याओं में भक्तों द्वारा किया जाता है।
लेकिन यहाँ एक संतुलित दृष्टि जरूरी है। धार्मिक परंपरा में पाठ को श्रद्धा और प्रार्थना का माध्यम माना जा सकता है, पर इसे किसी आर्थिक समस्या का निश्चित या वैज्ञानिक समाधान मानना उचित नहीं होगा। यदि किसी व्यक्ति पर कर्ज है, नौकरी नहीं है या व्यापार में नुकसान हो रहा है, तो अध्याय पढ़ने के साथ आर्थिक योजना, योग्य सलाह, खर्चों का नियंत्रण, रोजगार के प्रयास और आवश्यक विशेषज्ञ सहायता भी लेनी चाहिए। गुरुचरित्र का आध्यात्मिक संदेश मन में आशा पैदा कर सकता है; उस आशा को सही कर्म में बदलना साधक की जिम्मेदारी है। यही दृष्टिकोण श्रद्धा को अंधविश्वास से अलग करता है।
जब भक्त कहते हैं कि अध्याय 18 धन और समृद्धि देता है, तो “धन” शब्द का अर्थ व्यापक रूप से समझना उपयोगी है। धन केवल रुपये, संपत्ति या व्यापार का लाभ नहीं होता। स्वास्थ्य, परिवार में प्रेम, मानसिक शांति, अच्छे संबंध, काम करने की क्षमता, सही निर्णय लेने की बुद्धि और संतोष—ये सभी जीवन की समृद्धि के रूप हैं। गुरुचरित्र की कथा में बाहरी आर्थिक परिवर्तन का प्रसंग है, लेकिन उसका आध्यात्मिक प्रभाव भीतर की स्थिति से जुड़ा है।
मान लीजिए किसी व्यक्ति के पास बहुत पैसा है लेकिन उसे हर समय डर रहता है कि पैसा खत्म हो जाएगा। क्या उसे वास्तव में समृद्ध कहा जा सकता है? दूसरी ओर कोई व्यक्ति सीमित साधनों में रहते हुए संतुष्ट, मेहनती, ईमानदार और परिवार के प्रति जिम्मेदार है तो उसके जीवन में एक अलग प्रकार की संपन्नता है। गुरु-कृपा का अर्थ केवल चीजों का मिलना नहीं, बल्कि चीजों का सही उपयोग करने की बुद्धि मिलना भी हो सकता है। अध्याय 18 इसी व्यापक समृद्धि की ओर संकेत करने वाली कथा के रूप में पढ़ा जा सकता है।
धन प्राप्त करने की इच्छा स्वाभाविक है, विशेषकर तब जब परिवार की आवश्यकताएँ पूरी करना कठिन हो। लेकिन धन के पीछे भागते हुए यदि संतोष, ईमानदारी और मानसिक शांति खो जाए तो समस्या का एक रूप दूसरे रूप में बदल जाता है। अध्याय 18 के संदर्भ में समृद्धि को इसलिए संतुलित रूप में समझना चाहिए। गुरु-कथा हमें यह प्रेरणा देती है कि आवश्यकता पूरी हो, परिवार सुरक्षित रहे और जीवन में धर्म तथा सदाचार बना रहे।
संतोष का अर्थ महत्वाकांक्षा छोड़ देना नहीं है। इसका अर्थ है अपनी प्रगति के लिए मेहनत करते हुए भी हर क्षण स्वयं को दूसरों से तुलना करके दुखी न करना। यदि अध्याय 18 का पाठ किसी व्यक्ति को निराशा से निकालकर सकारात्मक कर्म की ओर ले जाता है, तो उसका आध्यात्मिक लाभ वास्तविक जीवन में दिखाई दे सकता है। इस तरह धन की इच्छा भी अधिक स्वस्थ रूप लेती है—अत्यधिक लालच के बजाय आवश्यकताओं, जिम्मेदारियों और भविष्य की सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित होता है।
लोकप्रिय धार्मिक परंपरा में गुरुचरित्र अध्याय 18 को आर्थिक संकट और दारिद्र्य निवारण से जोड़ा जाता है। इसका सीधा आधार अध्याय में गरीब ब्राह्मण के दारिद्र्य से संबंधित प्रसंग है। कुछ आधुनिक धार्मिक वेबसाइटें और लेख इसे धनवृद्धि, कर्ज से राहत, व्यापार में सुधार और आर्थिक समस्याओं के लिए पढ़े जाने वाले अध्याय के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
भक्त के लिए इसका भाव यह हो सकता है कि वह अपनी आर्थिक चिंता गुरु के चरणों में रखकर मन को स्थिर करे। जब मन लगातार डर में रहता है तो निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है। प्रार्थना और पाठ मन को कुछ समय के लिए एकाग्र कर सकते हैं, जिससे व्यक्ति अपनी परिस्थितियों को शांत दिमाग से देख सके। इसलिए यदि कोई व्यक्ति अध्याय 18 का पाठ करता है, तो वह उसके साथ यह संकल्प भी रख सकता है कि मैं ईमानदार मेहनत करूंगा, अनावश्यक खर्च कम करूंगा, गलत साधनों से धन नहीं कमाऊंगा और गुरु के बताए सदाचार को जीवन में अपनाऊंगा।
आज आर्थिक चिंता का रूप बदल गया है। किसी के सामने नौकरी जाने का डर है, कोई प्रतियोगी परीक्षा में बार-बार असफल हो रहा है, कोई व्यवसाय में ग्राहकों की कमी से परेशान है और कोई कर्ज की किश्तों को लेकर तनाव में है। ऐसे समय में गुरुचरित्र अध्याय 18 को पढ़ने वाला व्यक्ति इसे आशा और मानसिक शक्ति के स्रोत की तरह देख सकता है। उपलब्ध धार्मिक सामग्री में भी इस अध्याय को नौकरी और व्यवसाय से जुड़ी समस्याओं के संदर्भ में लोकप्रिय बताया गया है।
फिर भी अध्याय का पाठ केवल इच्छा सूची बनाकर करने के बजाय आत्मचिंतन के साथ किया जाए तो इसका प्रभाव अधिक सार्थक हो सकता है। नौकरी चाहिए तो कौशल सुधारना, रिज्यूमे बेहतर करना, आवेदन करना और नेटवर्किंग करना जरूरी है। व्यवसाय में समस्या है तो बाजार, ग्राहक, लागत और उत्पाद का विश्लेषण करना जरूरी है। कर्ज है तो बजट बनाना और वित्तीय सलाह लेना जरूरी है। भक्ति मन को दिशा दे सकती है, लेकिन कर्म उस दिशा में चलने का काम करता है। यही संतुलन गुरुचरित्र के संदेश को आधुनिक जीवन में उपयोगी बनाता है।
अध्याय 18 पढ़ने के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज मन की श्रद्धा और एकाग्रता है। पाठ करने से पहले स्नान करके स्वच्छ स्थान पर बैठना, श्रीगुरु या दत्तात्रेय का स्मरण करना और कुछ क्षण शांत होकर मन को स्थिर करना भक्तिपरंपरा में सामान्य रूप से अपनाया जाता है। किसी विशेष विधि को हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य मानना आवश्यक नहीं है, क्योंकि अलग-अलग परंपराओं में पाठ की पद्धतियाँ अलग हो सकती हैं। उपलब्ध धार्मिक स्रोत भी अध्याय 18 के नियमित पाठ और विभिन्न धार्मिक अवसरों पर इसके वाचन की परंपरा का उल्लेख करते हैं।
पाठ करते समय शब्दों का उच्चारण जितना संभव हो उतना स्पष्ट रखना अच्छा है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है अर्थ और भाव को समझना। यदि भाषा समझ में नहीं आती तो भावार्थ पढ़ना उपयोगी हो सकता है। पाठ के बाद कुछ समय शांत बैठकर यह विचार करना चाहिए कि कथा से आज के जीवन के लिए क्या संदेश मिला। यदि आर्थिक परेशानी के कारण पाठ किया जा रहा है, तो प्रार्थना के साथ यह संकल्प भी किया जा सकता है कि व्यक्ति अपने स्तर पर सही कर्म करेगा। इस तरह पाठ केवल धार्मिक क्रिया न रहकर जीवन में सकारात्मक अनुशासन का हिस्सा बन सकता है।
संकल्प का अर्थ केवल कोई बड़ी इच्छा मांगना नहीं है। एक सरल संकल्प हो सकता है—“हे श्रीगुरुदेव, मुझे सही मार्ग पर चलने की बुद्धि दें, मेरे परिवार की आवश्यकताएँ पूरी करने की शक्ति दें और कठिन समय में धैर्य दें।” इस प्रकार का संकल्प व्यक्ति को अपनी इच्छा के साथ जिम्मेदारी भी याद दिलाता है। यदि कोई केवल “मुझे पैसा चाहिए” कहकर पाठ करता है तो उसकी दृष्टि बहुत संकीर्ण हो सकती है; यदि वह “मुझे सही कर्म, विवेक और आवश्यक समृद्धि चाहिए” कहता है तो उसका भाव अधिक व्यापक हो जाता है।
संकल्प करते समय दूसरों का अहित चाहना, किसी व्यक्ति को नुकसान पहुँचाने की इच्छा रखना या केवल लालच के उद्देश्य से धार्मिक पाठ करना गुरुचरित्र की मूल भावना से मेल नहीं खाता। गुरु की कथा में सेवा, श्रद्धा और विनम्रता महत्वपूर्ण हैं। इसलिए संकल्प का केंद्र सद्बुद्धि, परिवार का कल्याण, ईमानदार आजीविका और आध्यात्मिक प्रगति होना अधिक सार्थक है। पाठ जितना बाहरी विधि से जुड़ा है, उतना ही वह मन की दिशा से भी जुड़ा है।
अध्याय 18 कितनी बार पढ़ना चाहिए, इसका कोई एक सार्वभौमिक उत्तर नहीं है। अलग-अलग दत्त परंपराओं और भक्तों में अलग-अलग नियम या संकल्प प्रचलित हो सकते हैं। कुछ आधुनिक धार्मिक स्रोत दैनिक पाठ की सलाह देते हैं, जबकि अन्य विशेष अवसरों या संकल्प के अनुसार पाठ की बात करते हैं।
इसलिए संख्या को लेकर अनावश्यक डर पैदा करने की आवश्यकता नहीं है। यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन एक बार श्रद्धा से पढ़ सकता है तो वह पर्याप्त नियमितता हो सकती है; यदि समय कम है तो वह सप्ताह में किसी निश्चित दिन पाठ कर सकता है। महत्वपूर्ण यह है कि पाठ के कारण जीवन में शांति, अनुशासन, सदाचार और सकारात्मक कर्म बढ़ें। यदि संख्या पूरी करने की चिंता इतनी बढ़ जाए कि मन अशांत हो जाए, तो पाठ का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है। भक्ति में नियमितता अच्छी है, लेकिन भय नहीं।
दत्तात्रेय परंपरा में गुरुवार को गुरु-उपासना से जोड़कर देखा जाता है, इसलिए अनेक भक्त इस दिन गुरुचरित्र का पाठ करते हैं। इसी प्रकार दत्तजयंती, अधिकमास या अन्य धार्मिक अवसरों पर गुरुचरित्र के विभिन्न अध्यायों के पाठ की परंपरा दिखाई देती है। कुछ आधुनिक स्रोत विशेष रूप से दत्तजयंती, अधिकमास और श्रावण जैसे अवसरों का उल्लेख अध्याय 18 के पाठ के संदर्भ में करते हैं।
फिर भी किसी एक दिन को अनिवार्य मानना जरूरी नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को जीवन में आर्थिक चिंता है और वह रोज कुछ समय अध्याय पढ़कर मन को स्थिर करता है, तो वह भी एक सार्थक साधना हो सकती है। गुरुवार को विशेष रूप से पूजा करना हो तो दीप, धूप, पुष्प और अपनी परंपरा के अनुसार नैवेद्य अर्पित किया जा सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पूजा की बाहरी सामग्री से अधिक मन की श्रद्धा और आचरण की शुद्धता पर ध्यान दिया जाए।
गुरुचरित्र अध्याय 18 की सबसे बड़ी सीख यह है कि किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति उसके आध्यात्मिक मूल्य को निर्धारित नहीं करती। गरीब ब्राह्मण के घर उपलब्ध भोजन बहुत साधारण है, लेकिन उसकी श्रद्धा असाधारण है। श्रीगुरु उस भावना को स्वीकार करते हैं और कथा आगे गुरु-कृपा के रूप में विकसित होती है।
दूसरी सीख है कि कठिन परिस्थितियों में भी अतिथि सेवा और दान की भावना मनुष्य को भीतर से समृद्ध बनाती है। तीसरी सीख है कि जीवन में आने वाले बदलाव हमेशा तुरंत समझ नहीं आते। गुरु द्वारा उस बेल को हटाना उस समय परिवार के लिए समस्या जैसा दिखाई दे सकता है, लेकिन कथा के आगे के परिणाम में वही घटना परिवर्तन का माध्यम बनती है। जीवन में भी कभी-कभी कोई पुराना सहारा समाप्त होता है और हमें लगता है कि सब कुछ बिगड़ गया; बाद में वही परिवर्तन नए अवसर की शुरुआत बन सकता है। अध्याय 18 इसी दृष्टि से कठिन समय में धैर्य रखने की प्रेरणा देता है।
गुरुचरित्र का आधार ही गुरु और शिष्य के संबंध पर टिका है। अध्याय 18 की शुरुआत में सिद्धमुनि के प्रति नामधारक की श्रद्धा और गुरुचरित्र की कथा सुनने की उत्कंठा दिखाई देती है। वह गुरु के चरणों में सिर रखकर कृपा की याचना करता है, जिसके बाद सिद्धमुनि कथा आगे बताते हैं।
शरणागति का अर्थ अपनी बुद्धि को बंद कर देना नहीं है। इसका अर्थ यह हो सकता है कि व्यक्ति अपनी सीमाओं को स्वीकार करते हुए उच्चतर सत्य, सदाचार और सही मार्गदर्शन के प्रति खुला रहे। गुरु से प्रार्थना करते समय यदि हम अपने कर्मों की जिम्मेदारी भी स्वीकार करें, तो शरणागति अधिक स्वस्थ और सार्थक बनती है। गुरु पर विश्वास और अपने कर्म पर जिम्मेदारी—इन दोनों का संतुलन अध्याय 18 के संदेश को आज के जीवन में विशेष रूप से प्रासंगिक बनाता है।
आज के समय में गुरुचरित्र अध्याय 18 को केवल प्राचीन कथा के रूप में पढ़ना आवश्यक नहीं है। इसकी कहानी आधुनिक मनुष्य की कई मानसिक स्थितियों से जुड़ती है—आर्थिक असुरक्षा, भविष्य का डर, परिवार की चिंता, सीमित संसाधन और अचानक आने वाले परिवर्तन। गरीब ब्राह्मण की स्थिति हमें याद दिलाती है कि कठिनाई के समय मनुष्य को अपनी गरिमा और विश्वास बनाए रखने की आवश्यकता होती है। श्रीगुरु की कथा यह संदेश देती है कि अभाव हमेशा अंतिम स्थिति नहीं होता।
लेकिन आधुनिक संदर्भ में इसका अर्थ यह भी है कि हमें आध्यात्मिकता को व्यावहारिक बुद्धि से जोड़ना चाहिए। अगर पैसे की समस्या है तो बजट बनाना चाहिए। अगर नौकरी की समस्या है तो कौशल बढ़ाना चाहिए। अगर व्यवसाय में समस्या है तो रणनीति बदलनी चाहिए। अगर तनाव है तो परिवार, मित्र या योग्य विशेषज्ञ से बात करनी चाहिए। गुरुचरित्र मन को संभाल सकता है; जीवन के व्यावहारिक निर्णय हमें स्वयं लेने होते हैं। यही दृष्टिकोण श्रद्धा को मजबूत और संतुलित बनाता है।
गुरुचरित्र अध्याय 18 को लेकर इंटरनेट पर कई दावे मिलते हैं कि इसे पढ़ते ही निश्चित रूप से धन मिलेगा, कर्ज समाप्त हो जाएगा या हर आर्थिक समस्या अपने आप दूर हो जाएगी। धार्मिक आस्था का सम्मान करते हुए भी ऐसे दावों को निश्चित आर्थिक गारंटी की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं है। कुछ स्रोत इसे धनवृद्धि और आर्थिक संकट से राहत के लिए प्रभावी अध्याय बताते हैं, लेकिन ये धार्मिक मान्यताएँ और भक्तिपरंपरा की व्याख्याएँ हैं, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित वित्तीय परिणाम नहीं।
इसका मतलब यह नहीं कि पाठ का कोई मूल्य नहीं है। प्रार्थना, ध्यान और धार्मिक पाठ व्यक्ति को मानसिक स्थिरता, आशा और अनुशासन दे सकते हैं। लेकिन यदि किसी व्यक्ति पर गंभीर कर्ज है तो उसे ऋणदाता से बात करने, बजट बनाने या वित्तीय सलाह लेने की जरूरत होगी। यदि नौकरी नहीं है तो आवेदन और कौशल विकास जरूरी होंगे। श्रद्धा को कर्म का विकल्प नहीं, कर्म की शक्ति बढ़ाने वाला सहारा समझना अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण है।
पूरे अध्याय का भावार्थ कुछ शब्दों में कहा जाए तो यह “अभाव में भी श्रद्धा, सेवा में भी समर्पण और कठिन समय में गुरु पर विश्वास” का संदेश देता है। अमरापुर की महिमा साधक को पवित्र वातावरण में ले जाती है, पंचगंगा का संगम विविध धाराओं के एक होने की भावना जगाता है, औदुंबर कल्पतरु के रूप में आश्रय का प्रतीक बनता है और गरीब ब्राह्मण की कथा मनुष्य की वास्तविक परीक्षा सामने रखती है। जब संसाधन कम हों तब व्यक्ति क्या करता है—यही प्रश्न कथा के केंद्र में दिखाई देता है।
गरीब ब्राह्मण के पास बहुत कुछ नहीं था, लेकिन उसने अपनी क्षमता के अनुसार गुरु का सत्कार किया। यही वह बिंदु है जहाँ कथा बाहरी गरीबी से उठकर आंतरिक समृद्धि की बात करने लगती है। गुरु-कृपा के प्रसंग को भक्त धन प्राप्ति के रूप में देखते हैं, लेकिन उसका गहरा संदेश यह भी है कि जीवन में पुराने भय और सीमित सोच को छोड़कर विश्वास के साथ आगे बढ़ना चाहिए। इसलिए अध्याय 18 को पढ़ते समय केवल परिणाम की प्रतीक्षा करने के बजाय उसके संदेश को अपने व्यवहार में उतारना अधिक महत्वपूर्ण है।
गुरुचरित्र अध्याय 18 दत्त भक्तों के लिए श्रद्धा, गुरु-कृपा, अमरापुर महिमा और दारिद्र्य निवारण की कथा के कारण विशेष महत्व रखता है। उपलब्ध मूल पाठों में पंचगंगा और कृष्णा के संगम, अमरापुर, औदुंबर, अमरेश्वर और गरीब ब्राह्मण परिवार से जुड़े प्रसंग विस्तार से आते हैं। इस अध्याय की सबसे लोकप्रिय कथा यही सिखाती है कि साधन कम होने पर भी भक्ति और सेवा कम नहीं होनी चाहिए।
यदि आप आर्थिक परेशानी, नौकरी की चिंता या जीवन की किसी कठिन परिस्थिति के कारण अध्याय 18 पढ़ना चाहते हैं, तो इसे श्रद्धा और सकारात्मक कर्म दोनों के साथ पढ़ना बेहतर होगा। श्रीगुरु से केवल धन नहीं, बल्कि सही निर्णय लेने की बुद्धि, मेहनत करने की शक्ति, परिवार के लिए जिम्मेदारी निभाने की क्षमता और कठिन समय में धैर्य मांगना अधिक व्यापक प्रार्थना हो सकती है। धार्मिक मान्यता के स्तर पर भक्त इसे गुरु-कृपा का अध्याय मानते हैं, जबकि व्यावहारिक जीवन में इसका संदेश आशा, संयम, सेवा और कर्म के रूप में लिया जा सकता है। आखिरकार, यही अध्याय 18 की सुंदरता है—यह हमें केवल समृद्धि मांगना नहीं, बल्कि समृद्धि को सही ढंग से संभालने योग्य बनना भी सिखाता है।
गुरुचरित्र अध्याय 18 मुख्य रूप से गरीब ब्राह्मण के दारिद्र्य निवारण और श्रीगुरु नृसिंह सरस्वती की कृपा से जुड़े प्रसंग के कारण प्रसिद्ध है। भक्त परंपरा में इसे आर्थिक संकट और समृद्धि से जोड़कर पढ़ा जाता है।
हाँ, धार्मिक परंपरा में कई भक्त आर्थिक परेशानी, दारिद्र्य या धन संबंधी चिंता के समय इसका पाठ करते हैं। हालांकि इसे निश्चित वित्तीय परिणाम की गारंटी नहीं मानना चाहिए। पाठ के साथ ईमानदार मेहनत, वित्तीय योजना और आवश्यक व्यावहारिक कदम उठाना भी जरूरी है।
कथा के अनुसार एक अत्यंत गरीब ब्राह्मण परिवार भिक्षा और घर में उपलब्ध साधारण भोजन के सहारे जीवन चलाता था। श्रीगुरु उसके घर भिक्षा स्वीकार करते हैं और परिवार की श्रद्धा से प्रसन्न होते हैं। इसके बाद घेवड़े की बेल से जुड़ी गुरु-लीला और परिवार के जीवन में आने वाला परिवर्तन अध्याय का महत्वपूर्ण प्रसंग बनता है।
रोज पढ़ना अनिवार्य है, ऐसा कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है। अलग-अलग गुरुचरित्र परंपराओं में पाठ की विधि और संकल्प अलग हो सकते हैं। श्रद्धा, नियमितता और कथा के भाव को समझना केवल संख्या पूरी करने से अधिक महत्वपूर्ण है।
इस अध्याय का प्रमुख संदेश गुरु पर श्रद्धा, कठिन समय में धैर्य, अपनी क्षमता के अनुसार सेवा और सद्कर्म है। धन और समृद्धि का प्रसंग महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे केवल पैसा पाने की कथा के रूप में देखना अध्याय के व्यापक आध्यात्मिक संदेश को सीमित कर देता है। अमरापुर की तीर्थ-महिमा और गरीब ब्राह्मण की कथा मिलकर गुरु-कृपा तथा आंतरिक विश्वास की भावना को सामने लाती है।

॥ श्रीगणेशाय नमः । श्रीसरस्वत्यै नमः । श्रीगुरुभ्यो नमः ॥
॥१॥
जय जया सिद्धमुनि । तू तारक भवार्णी ।
सुधारस आमुचे श्रवणी । पूर्ण केला दातारा ॥
॥२॥
गुरुचरित्र कामधेनु । ऐकता न-धाये माझे मन ।
कांक्षीत होते अंतःकरण । कथामृत ऐकावया ॥
॥३॥
ध्यान लागले श्रीगुरुचरणी । तृप्ति नव्हे अंतःकरणी ।
कथामृत संजीवनी । आणिक निरोपावे दातारा ॥
॥४॥
येणेपरी सिद्धासी । विनवी शिष्य भक्तीसी ।
माथा लावूनि चरणांसी । कृपा भाकी तये वेळी ॥
॥५॥
शिष्यवचन ऐकोनि । संतोषला सिद्धमुनि ।
सांगतसे विस्तारोनि । ऐका श्रोते एकचित्ते ॥
॥६॥
ऐक शिष्या शिकामणी । धन्य धन्य तुझी वाणी ।
तुझी भक्ति श्रीगुरुचरणी । तल्लीन झाली परियेसा ॥
॥७॥
तुजकरिता आम्हांसी । चेतन जाहले परियेसीं ।
गुरुचरित्र आद्यंतेसी । स्मरण जाहले अवधारी ॥
॥८॥
भिल्लवडी स्थानमहिमा । निरोपिला अनुपमा ।
पुढील चरित्र उत्तमा । सांगेन ऐका एकचित्तें ॥
॥९॥
क्वचित्काळ तये स्थानी । श्रीगुरु होते गौप्येनि ।
प्रकट जहाले म्हणोनि । पुढे निघाले परियेसा ॥
॥१०॥
वरुणासंगम असे ख्यात । दक्षिणवाराणसी म्हणत ।
श्रीगुरु आले अवलोकित । भक्तानुग्रह करावया ॥
॥११॥
पुढें कृष्णातटाकांत । श्रीगुरू तीर्थे पावन करीत ।
पंचगंगगासंगम ख्यात । तेथें राहिले द्वादशाब्दे ॥
॥१२॥
अनुपम्य तीर्थ मनोहर । जैसें अविमुक्त काशीपुर ।
प्रयागसमान तीर्थ थोर । म्हणोनि राहिले परियेसा ॥
॥१३॥
कुरवपुर ग्राम गहन । कुरूक्षेत्र तोंचि जाण ।
पंचगंगासंगम कृष्णा । अत्योत्त्म परियेसा ॥
॥१४॥
कुरुक्षेत्रीं जितके पुण्य । तयाहूनि अधिक असे जाण ।
तीर्थे अस्ती अगण्य़ । म्हणोनि राहिले श्रीगुरू ॥
॥१५॥
पंचगंगानदीतीर । प्रख्यात असे पुराणांतर ।
पांच नामे आहेति थोर । सांगेन ऐका एकचित्तें ॥
॥१६॥
शिवा भद्रा भोगावती । कुंभीनदी सरस्वती ।
‘पंचगंगा’ ऐसी ख्याति । महापातक संहारी ॥
॥१७॥
ऐसी प्रख्यात पंचगंगा । आली कृष्णेचिया संगा ।
प्रयागाहूनि असे चांगा । संगमस्थान मनोहर ॥
॥१८॥
अमरापुर म्हणिजे ग्राम । स्थान असे अनुपम्य ।
जैसा प्रयागसंगम । तैसे स्थान मनोहर ॥
॥१९॥
वृक्ष असे औदुंबर । प्रत्यक्ष जाणा कल्पतरु ।
देव असे अमरेश्वर । तया संगमा षटकूळी ॥
॥२०॥
जैसी वाराणसी पुरी । गंगाभागीरथी-तीरी ।
पंचनदींसंगम थोरी । तत्समान परियेसा ॥
॥२१॥
अमरेश्वरसंनिधानी । आहेति चौसष्ट योगिनी ।
शक्तितीर्थ निर्गुणी । प्रख्यात असे परियेसा ॥
॥२२॥
अमरेश्वरलिंग बरवे । त्यासी वंदुनि स्वभावे ।
पुजितां नर अमर होय । विश्वनाथ तोचि जाणा ॥
॥२३॥
प्रयागी करितां माघस्नान । जें पुण्य होय साधन ।
शतगुण होय तयाहून । एक स्नाने परियेसा ॥
॥२४॥
सहज नदीसंगमांत । प्रयागसमान असे ख्यात ।
अमरेश्वर परब्रह्म वस्तु । तया स्थानी वास असे ॥
॥२५॥
याकारणें तिये स्थानी । कोटितीर्थे असती निर्गुणी ।
वाहे गंगो दक्षिणी । वेणीसहित निरंतर ॥
॥२६॥
अमित तीर्थे तया स्थानी । सांगता विस्तार पुराणीं ।
अष्टतीर्थ ख्याति जीण । तया कृष्णातटाकांत ॥
॥२७॥
उत्तर दिशी असे देखा वहे कृष्णा पश्चिममुखा ।
‘शुक्लतीर्थ’ नाम ऐका । ब्रहम्हत्यापाप दूर ॥
॥२८॥
औदुंबर सन्मुखेसी । तीनी तीर्थे परियेसी ।
एकानंतर एक धनुषी । तीर्थे असती मनोहर ॥
॥२९॥
‘पापविनाशी’ ‘काम्यतीर्थ’ । तिसरें सिध्द ‘वरदतीर्थ ।
अमरेश्वरसंनिधार्थ । अनुपम्य असे भूमंडळी ॥
॥३०॥
पुढें संगम-षट्कुळांत । प्रयागतीर्थ असे ख्यात ।
‘शाक्तितीर्थ’ अमरतीर्थ’ । कोटितीर्थ’ परियेसा ॥
॥३१॥
तीर्थे असती अपरांपर । सांगता असे विस्तार ।
याकारणें श्रीपादगुरु । राहिले तेथें द्वादशाब्दें ॥
॥३२॥
कृष्णा वेणी नदी दोनी । पंचगंगा मिळोनी ।
सप्तनदीसंगम सगुणी । काय सांगू महिमा त्याची ॥
॥३३॥
ब्रह्महत्यादि महापातकें । जळोनि जातीं स्नानें एकें ।
ऐसें सिध्द्स्थान निकें । सकळाभीष्ट होय तेथें ॥
॥३४॥
काय सांगूं त्यांची महिमा । आणिक द्यावया नाहीं उपमा ।
दर्शनमातें होती काम्या । स्नानफळ काय वर्णू ॥
॥३५॥
साक्षात् कल्पतरु । असे वृक्ष औदुबरु ।
गौप्य होऊन अगोचरु । राहिले श्रीगुरु तया स्थानी ॥
॥३६॥
भक्तजनतारणार्थ । होणार असे ख्यात ।
राहिले तेथें श्रीगुरुनाथ । म्हणोनि प्रकट जाहले जाणा ॥
॥३७॥
असता पुढें वर्तमानीं । भिक्षा करावया प्रतिदिनीं ।
अमरापुर ग्रामी । जाती श्रीगुरु परियेसा ॥
॥३८॥
तया ग्रामी द्विज एक । असे वेदभ्यासक ।
त्याची भार्या पतिसेवक । पतिव्रतशिरोमणी ॥
॥३९॥
सुक्षीण असे तो ब्राह्मण । शुक्लभिक्षा करी आपण ।
कर्ममार्गी आचरण । असे सात्विक वृत्तीनें ॥
॥४०॥
तया विप्रमंदिरांत । असे वेल उन्नत ।
शेंगा निघती नित्य बहुत । त्याणे उदरपूर्ति करी ॥
॥४१॥
एखादे दिवशी त्या ब्राह्मणासी । वरो न मिळे परियेसीं ।
तया शेंगांते रांधोनि हर्षी । दिवस क्रमी येणेंपरी ॥
॥४२॥
ऐसा तो ब्राह्मण दरिद्री । याचकारणें उदर भरी ।
पंचमहायज्ञ कुसरी । अतिथि पूजी भक्तीनें ॥
॥४३॥
वर्तता श्रीगुरु एके दिवसीं । तया विप्रमंदिरासी ।
गेले आपण भिक्षेसी । नेलें विप्रे भक्तिनें ॥
॥४४॥
भक्तिपूर्वक श्रीगुरूसी । पूजा करी तो षोडशी ।
घेवडे-शेंगा बहुवसी । केली होती पत्र-शाका ॥
॥४५॥
भिक्षा करून ब्राह्मणासी । आश्वासिती गुरु संतोषी ।
गेलें तुझे दरिद्र दोषी । म्हणोनी निघती तये वेळी ॥
॥४६॥
तया विप्राचे गृहांत । जो का होता वेल उन्नत ।
घेवडा नाम विख्यात । आंगण सर्व वेष्टिलें असे ॥
॥४७॥
तया वेलाचें झाडमूळ श्रीगुरुमूर्ति छेदिती तात्काळ ।
टाकोनि देती परिबळें । गेले आपण संगमासी ॥
॥४८॥
विप्रवनिता तये वेळी । दु:ख करिती पुत्र सकळी ।
म्हणती पहा हो दैव बळी । कैसें अदृष्ट आपुलें ॥
॥४९॥
आम्हीं तया यतीश्वरासी । काय उपद्रव केला त्यासी ।
आमुचा ग्रास छेदुनी कैसी । टाकोनि दिल्हा भूमीवरी ॥
॥५०॥
ऐसेपरी ते नारी । दु:ख करी नानापरी ।
पुरुष तिचा कोप करी । म्हणे प्रारब्ध प्रमाण ॥
॥५१॥
म्हणे स्त्रियेसी तये वेळी । जें जें होणार जया काळी ।
निर्माण करी चंद्रमोळी । तया आधीन । विश्व जाण ॥
॥५२॥
विश्वव्यापक नारायण । उत्पत्तिस्थितिलया कारण ।
पिपीलिकादि स्थूळ-जीवन । समस्तां आहार पुरवीतसे ॥
॥५३॥
‘आयुरन्नं प्रयच्छति’ । ऐसें बोले वेदश्रुति ।
पंचानन आहार हस्ती । केवी करी प्रत्यही ॥
॥५४॥
चौर्यायशी लक्ष जीवराशी । स्थूल सूक्ष्म समस्तांसी ।
निर्माण केलें आहारासी । मग उत्पत्ति तदनंतरें ॥
॥५५॥
रंकरायासी एक दृष्टी । करुनि निक्षेपण ।
सकृत अथवा दुष्कृत्य जाण । आपुलें आपणचि भोगणें । पुढील्यावरी काय बोल ॥
॥५६॥
आपुलें दैव असतां उणें । पुढिल्या बोलती मूर्खपणे ।
जे पेरिलें तोंचि भक्षणें । कवणावरी बोल सांगे ॥
॥५७॥
बोल ठेविसी यतीश्वरासी । आपलें आर्जव न विचारिसी ।
ग्रास हरितला म्हणसी । अविद्यासागरी बुडोनि ॥
॥५८॥
तो तारक आम्हांसी । म्हणोनि आला भिक्षेसी ।
नेलें आमुचे दरिद्रदोषी । तोचि तारील आमुतें ॥
॥५९॥
येणेंपरी स्त्रियेसी । संभाषी विप्र परियेसी ।
काढोनि वेलशाखेसी । टाकीता झाला गंगेत ॥
॥६०॥
तया वेलाचें मूळ थोरी । जे कां होतें आपुले द्वारी ।
काढूं म्हणुनि द्विजवरी । खणिता झाला तया वेळीं ॥
॥६१॥
काढितां वेलमूळासी । लाधला कुंभे निधानेसी ।
आनंद जाहला बहुवसी । घेऊनि गेला घरांत ॥
॥६२॥
म्हणती नवल काय वर्तले । यतीश्वर आम्हां प्रसन्न्न झाले ।
म्हणोनि ह्या वेला छेदिलें । निधान लाधलें आम्हांसी ॥
॥६३॥
नर नव्हे तो योगीश्वर होईल ईश्वरीअवतार ।
आम्हां भेटला दैन्यहर । म्हणती चला दर्शनासी ॥
॥६४॥
जाऊनि संगमा श्रीगुरुसी । पूजा करिती बहुवसी ।
वृत्तांत सांगती तयासी । तये वेळी परियेसा ॥
॥६५॥
श्रीगुरु म्हणती तयासी । तुम्ही न सांगणें कवणासी ।
प्रकट करितां आम्हांसी । नसेल लक्ष्मी तुमचे घरी ॥
॥६६॥
ऐसेपरी तया द्विजासी । सांगे श्रीगुरु परियेसी ।
अखंड लक्ष्मी तुमचे वंशी । पुत्रपौत्री नांदाल ॥
॥६७॥
ऐसा वर लधोन । गेली वनिता तो ब्राह्मण ।
श्रीगुरुकृपा ऐसी जाण । दर्शनमात्रे दैन्य हरे ॥
॥६८॥
ज्यासी होय श्रीगुरुकृपा । त्यासी कैचें दैन्य पाप ।
कल्पवृक्ष-आश्रय करितां बापा । दैन्य कैंचे तया घरी ॥
॥६९॥
दैव उणा असेल जो नरु । त्याणें आश्रयावा श्रीगुरु ।
तोचि उतरेल पैलपारु । पूज्य होय सकळिकांई ॥
॥७०॥
जो कोण भजेल श्रीगुरु । त्यासी लाधेल इह-परु ।
अखंड लक्ष्मी त्याचे घरी । अष्टैश्वर्ये नांदती ॥
॥७१॥
सिध्द म्हणे नामधारकासी । श्रीगुरुमहिमा असे ऐसी ।
भजावे तुम्हीं मनोमानसीं । कामधेनु तुझ्या घरीं ॥
॥७२॥
गंगाधराचा कुमर । सांगे श्रीगुरुचरित्रविस्तार ।
पुढील कथामृतसार । ऐका श्रोते एकचित्तें ॥
॥७३॥
इति श्रीगुरुचरित्रामृते परमकथाकल्पतरौ श्रीनृसिंहसरस्वत्युपाख्याने सिध्द-नामधारकसंवादे अमरापुरमहिमानं-द्विजदैन्यहरणं नाम अष्टादशोऽध्याय: ॥ १८ ॥
॥ श्रीगुरुदत्तात्रेयार्पणमस्तु ॥
॥ श्रीगुरुदेवदत्त ॥
गुरुचरित्र अध्याय 18: Gurucharitra Adhyay 18 PDF