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श्री गुरुचरित्र दत्तात्रेय संप्रदाय की अत्यंत महत्वपूर्ण भक्तिपरक रचना मानी जाती है। इसकी रचना परंपरागत रूप से श्री सरस्वती गंगाधर से जोड़ी जाती है और इसमें श्रीपाद श्रीवल्लभ तथा श्री नृसिंह सरस्वती के जीवन, उपदेश, चमत्कार और भक्तों के अनुभवों का वर्णन मिलता है। गुरूचरित्र अध्याय 14 इसी व्यापक आध्यात्मिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे भक्त श्रद्धा के साथ पढ़ते और सुनते हैं। इस अध्याय को केवल एक पुरानी कथा के रूप में देखने के बजाय उसके भीतर छिपे गुरु-तत्त्व, श्रद्धा, सेवा, कर्म और आत्मसमर्पण के संदेश को समझना अधिक उपयोगी है।
गुरुचरित्र का मूल आकर्षण यही है कि इसकी कथाएँ सामान्य जीवन की परिस्थितियों से आध्यात्मिक अर्थ निकालने का अवसर देती हैं। मनुष्य जब कठिनाई में होता है, तब उसे अक्सर किसी ऐसे मार्गदर्शक की आवश्यकता महसूस होती है जो केवल समस्या का समाधान न बताए, बल्कि उसके भीतर धैर्य और विवेक भी जगाए। अध्याय 14 को इसी दृष्टि से पढ़ने पर गुरु और शिष्य के संबंध की गहराई सामने आती है। यहाँ गुरु केवल वरदान देने वाले व्यक्ति नहीं, बल्कि साधक को उसके कर्म, विश्वास और आचरण का अर्थ समझाने वाले आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में दिखाई देते हैं। यही कारण है कि आज भी गुरुचरित्र के अध्यायों का पाठ अनेक दत्तभक्तों की दैनिक या पारायण साधना का हिस्सा बना हुआ है।

गुरुचरित्र को समझने के लिए पहले उसकी परंपरा को समझना जरूरी है। दत्तात्रेय परंपरा में गुरु को ज्ञान और आत्मबोध की ओर ले जाने वाला माध्यम माना जाता है। श्रीपाद श्रीवल्लभ और श्री नृसिंह सरस्वती को दत्तात्रेय के प्रमुख अवतारी स्वरूपों में श्रद्धा से स्मरण किया जाता है। ग्रंथ की कथा-शैली में अनेक प्रसंग ऐसे हैं जिनमें साधारण मनुष्य की चिंता, भय, बीमारी, आर्थिक संकट, पारिवारिक परेशानी और आध्यात्मिक जिज्ञासा के साथ गुरु की कृपा का संबंध दिखाया गया है।
यही कारण है कि गुरूचरित्र का पाठ केवल कथा पढ़ना नहीं माना जाता। भक्त जब अध्याय पढ़ता है तो वह अपने जीवन को भी उन घटनाओं के सामने रखता है। क्या मेरे भीतर पर्याप्त श्रद्धा है? क्या मैं कठिन समय में धैर्य रखता हूँ? क्या मैं केवल अपनी इच्छा पूरी कराने के लिए गुरु को याद करता हूँ, या अपने आचरण को सुधारने के लिए भी गुरु-वाणी को स्वीकार करता हूँ? ऐसे प्रश्न अध्यायों को अधिक अर्थपूर्ण बनाते हैं। अध्याय 14 का अध्ययन भी इसी आत्मचिंतन की भावना से किया जाए तो उसका प्रभाव केवल धार्मिक पाठ तक सीमित नहीं रहता।
अध्याय 14 की कथा को समझते समय उसके धार्मिक संदर्भ और पारंपरिक पाठ दोनों को ध्यान में रखना चाहिए। अलग-अलग संस्करणों में भाषा, वर्तनी या प्रस्तुति में छोटे अंतर मिल सकते हैं, इसलिए किसी विशेष संस्करण की शब्दशः कथा और उसके आध्यात्मिक अर्थ को अलग-अलग समझना बेहतर है। गुरूचरित्र अध्याय 14 का मूल आकर्षण गुरु की उपस्थिति, भक्तिभाव और जीवन की परीक्षा के बीच विश्वास बनाए रखने की भावना में दिखाई देता है। कथा का उद्देश्य केवल कोई घटना बताना नहीं, बल्कि यह दिखाना है कि गुरु-शरण में आने वाले व्यक्ति के लिए श्रद्धा और सदाचार कितने महत्वपूर्ण हैं।
ऐसे प्रसंगों में एक बात बार-बार उभरकर आती है—गुरु की कृपा को केवल बाहरी चमत्कार के रूप में नहीं देखना चाहिए। कई बार कठिन परिस्थिति स्वयं साधक के भीतर परिवर्तन का माध्यम बनती है। जिस प्रकार आग सोने को तपाकर उसकी अशुद्धियाँ दूर करती है, उसी प्रकार जीवन की कठिनाइयाँ मनुष्य को धैर्य, संयम और विवेक सिखा सकती हैं। गुरुचरित्र की कथा-परंपरा इसी दृष्टि से पाठक को भीतर की यात्रा की ओर ले जाती है।
गुरूचरित्र अध्याय 14 को पढ़ते हुए सबसे पहले गुरु और भक्त के बीच विश्वास की भावना पर ध्यान देना चाहिए। भक्ति परंपरा में विश्वास का अर्थ आंख बंद करके हर बात स्वीकार करना नहीं है। इसका गहरा अर्थ यह है कि साधक अपने अहंकार को थोड़ा पीछे रखकर मार्गदर्शन को ग्रहण करने की क्षमता विकसित करे। जब मनुष्य स्वयं को ही हर समस्या का अंतिम निर्णायक मानता है, तब वह अक्सर भय और भ्रम में उलझ जाता है। गुरु-तत्त्व उसे यह याद दिलाता है कि जीवन केवल तत्काल दिखाई देने वाली घटना का नाम नहीं है।
अध्याय की कथा इसी व्यापक संदेश को सामने रखती है कि भक्ति की असली परीक्षा कठिन समय में होती है। सुख के दिनों में भगवान और गुरु का स्मरण करना सरल लगता है, लेकिन जब परिस्थितियाँ मन के अनुसार नहीं चलतीं, तब श्रद्धा की वास्तविक गहराई सामने आती है। इसलिए इस अध्याय को पढ़ते समय केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि कथा में किसे क्या प्राप्त हुआ। उससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न है—उस व्यक्ति ने किस भावना से गुरु का आश्रय लिया, उसके व्यवहार में क्या परिवर्तन आया और उसके अनुभव से पाठक को क्या सीख मिलती है।
गुरुचरित्र की कथाओं में परीक्षा एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक प्रतीक है। परीक्षा का अर्थ हमेशा कोई चमत्कारिक घटना नहीं होता। कभी यह बीमारी या संकट के रूप में सामने आती है, कभी सामाजिक परिस्थिति के रूप में और कभी अपने ही मन के संदेह के रूप में। संदेह, अधैर्य और अहंकार ऐसे आंतरिक अवरोध हैं जो साधना को कमजोर कर सकते हैं। गुरु की कृपा का अर्थ यह नहीं कि भक्त के जीवन में कभी कठिनाई नहीं आएगी; बल्कि परंपरागत दृष्टि में गुरु-कृपा साधक को कठिनाई का सामना करने की शक्ति और सही दृष्टि दे सकती है।
यह संदेश आज भी बेहद व्यावहारिक है। मान लीजिए किसी व्यक्ति के सामने नौकरी, परिवार या आर्थिक समस्या है। यदि वह केवल तत्काल परिणाम की चिंता करता रहे तो उसका मन लगातार बेचैन रहेगा। लेकिन यदि वह अपनी जिम्मेदारियाँ ईमानदारी से निभाते हुए धैर्य, प्रार्थना और विवेक बनाए रखे, तो समस्या से निपटने की उसकी क्षमता बदल सकती है। गुरुचरित्र की आध्यात्मिक भाषा में यही भीतर का परिवर्तन गुरु-कृपा से जुड़ा हुआ माना जाता है।
गुरुचरित्र में गुरु-भक्ति केवल पूजा या पाठ तक सीमित नहीं है। उसका संबंध सेवा, विनम्रता और आचरण से भी है। किसी गुरु को मानने का अर्थ उनके नाम का जाप करना भर नहीं, बल्कि उनके बताए सदाचार को जीवन में उतारने का प्रयास करना भी है। यदि व्यक्ति पूजा तो करता है लेकिन व्यवहार में छल, क्रोध, अहंकार और स्वार्थ को बढ़ाता रहता है, तो उसके लिए अध्याय का वास्तविक संदेश अधूरा रह जाता है।
सेवा का अर्थ भी केवल धार्मिक स्थान पर कोई कार्य करना नहीं है। माता-पिता की उचित सेवा, जरूरतमंद की सहायता, ईमानदारी से अपना काम करना, किसी दुखी व्यक्ति के प्रति संवेदनशील होना और अपनी जिम्मेदारियों से भागना नहीं—ये सभी व्यवहार गुरु-भक्ति की व्यापक भावना से जुड़े हो सकते हैं। इसीलिए अध्याय 14 को पढ़ने का सबसे सुंदर तरीका यह है कि उसके संदेश को अपने दैनिक व्यवहार में उतारने की कोशिश की जाए। पाठ समाप्त होने के बाद यदि मन थोड़ा शांत, व्यवहार थोड़ा विनम्र और दृष्टि थोड़ी अधिक सकारात्मक होती है, तो पाठ का उद्देश्य सार्थक होता है।
अध्याय 14 का केंद्रीय संदेश गुरु-भक्ति की उस परंपरा से जुड़ता है जिसमें श्रद्धा के साथ विवेक और आचरण को भी महत्व दिया जाता है। भक्त के लिए गुरु केवल बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि भीतर जागने वाले ज्ञान का प्रतीक भी हैं। गुरु की वाणी शिष्य को यह समझने में मदद करती है कि इच्छा और आवश्यकता में अंतर क्या है, भय और वास्तविक संकट में अंतर क्या है और कर्म तथा परिणाम के बीच संबंध कैसे समझा जाए।
इस दृष्टि से अध्याय 14 को पढ़ना मन को एक दिशा देने जैसा है। जीवन में जब कई आवाजें एक साथ हमें अलग-अलग दिशाओं में खींचती हैं, तब गुरु-तत्त्व एक स्थिर धुरी की तरह काम करता है। श्रद्धा मन को स्थिर करती है, सेवा अहंकार को नरम करती है और ज्ञान निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाता है। यही तीनों तत्व मिलकर गुरुचरित्र की साधना को केवल धार्मिक परंपरा से आगे ले जाते हैं।
श्रद्धा गुरुचरित्र की पूरी परंपरा का आधार है। लेकिन श्रद्धा को अंधविश्वास समझना उचित नहीं होगा। वास्तविक श्रद्धा व्यक्ति को अधिक जिम्मेदार, शांत और नैतिक बनाने वाली होनी चाहिए। यदि कोई धार्मिक कथा सुनने के बाद मनुष्य दूसरों के प्रति कठोर हो जाए या अपनी जिम्मेदारियों से बचने लगे, तो वह कथा के उद्देश्य को समझ नहीं पाया है।
गुरु पर श्रद्धा का अर्थ है—मार्गदर्शन स्वीकार करना, अपनी गलतियों को पहचानना और सुधार की दिशा में आगे बढ़ना। कठिन समय में यही श्रद्धा मनुष्य को टूटने से बचा सकती है। जैसे अंधेरे रास्ते पर एक दीपक पूरी यात्रा नहीं करता, लेकिन अगले कुछ कदम स्पष्ट कर देता है, वैसे ही गुरु का मार्गदर्शन जीवन की हर समस्या को तुरंत समाप्त किए बिना आगे बढ़ने की दिशा दे सकता है।
गुरुचरित्र की शिक्षाओं को समझते समय कर्म का विषय भी महत्वपूर्ण है। मनुष्य अपने कर्मों से पूरी तरह अलग होकर जीवन नहीं जी सकता। गुरु-कृपा और कर्म को एक-दूसरे के विरोध में रखने के बजाय दोनों को पूरक रूप में देखना अधिक सार्थक है। गुरु मार्ग दिखा सकते हैं, लेकिन रास्ते पर चलने का प्रयास साधक को ही करना पड़ता है।
इसे एक सरल उदाहरण से समझ सकते हैं। यदि किसी विद्यार्थी को बहुत अच्छा शिक्षक मिल जाए, तो उसके सफल होने की संभावना बढ़ सकती है, लेकिन पढ़ाई विद्यार्थी को ही करनी होगी। उसी तरह गुरु की कृपा साधक को प्रेरणा, दिशा और आंतरिक शक्ति दे सकती है, लेकिन सत्य, अनुशासन और सदाचार का अभ्यास स्वयं करना पड़ता है। इसीलिए अध्याय 14 का संदेश कर्म से पलायन नहीं, बल्कि विश्वास के साथ सही कर्म करने की प्रेरणा देता है।
गुरूचरित्र के अध्यायों का पाठ परंपरा में विशेष श्रद्धा के साथ किया जाता है। कुछ भक्त दैनिक रूप से एक अध्याय पढ़ते हैं, जबकि कुछ लोग निर्धारित अवधि में संपूर्ण गुरुचरित्र का पारायण करते हैं। अध्याय 14 का पाठ करते समय सबसे महत्वपूर्ण बात मन की एकाग्रता और श्रद्धा है, न कि केवल पाठ पूरा करने की जल्दी। यदि संभव हो तो शांत वातावरण चुनना, स्वच्छता रखना और पाठ के दौरान मोबाइल या अन्य व्यवधानों से दूरी बनाना उपयोगी हो सकता है।
किसी भी धार्मिक पाठ के लिए स्थानीय परंपरा, परिवार की मान्यता या गुरु-परंपरा के निर्देश अलग हो सकते हैं। इसलिए यदि कोई व्यक्ति विशेष पारायण-विधि, नियम, संकल्प या नैवेद्य का पालन करना चाहता है, तो अपनी परंपरा के जानकार व्यक्ति से पुष्टि करना उचित है। हर पाठक पर एक ही विधि अनिवार्य है, ऐसा मानना आवश्यक नहीं है। भक्ति का मूल भाव श्रद्धा, सात्त्विकता और आत्मचिंतन है।
पाठ के दौरान केवल शब्दों का उच्चारण करने के बजाय कथा का अर्थ समझने का प्रयास करें। जिस प्रसंग पर मन विशेष रूप से रुकता है, उसे अपने जीवन से जोड़कर देखें। क्या उसमें धैर्य की शिक्षा है? क्या वह अहंकार छोड़ने की बात करता है? क्या वह सेवा या सत्य की ओर संकेत करता है? ऐसे प्रश्न पाठ को अधिक जीवंत बनाते हैं।
यदि संस्कृत या मराठी शब्द समझने में कठिनाई हो तो हिंदी अर्थ वाला संस्करण पढ़ना भी उपयोगी हो सकता है। भाषा से अधिक महत्वपूर्ण भाव और अर्थ की समझ है। हालांकि पारंपरिक पाठ में उच्चारण की अपनी महत्ता हो सकती है, इसलिए जो व्यक्ति मंत्रोच्चार या विशिष्ट पाठ-विधि को शास्त्रीय रूप से करना चाहता है, वह किसी अनुभवी पाठक से उच्चारण सीख सकता है।
दैनिक जीवन में समय कम हो तो भी अध्याय का पाठ श्रद्धा से किया जा सकता है। सबसे पहले मन को शांत करें, गुरु या दत्तात्रेय का स्मरण करें और अपनी भावना स्पष्ट करें। इसके बाद अध्याय को बिना अनावश्यक जल्दबाजी के पढ़ें और अंत में कुछ मिनट शांत बैठकर उसके संदेश पर विचार करें।
एक सरल क्रम इस प्रकार रखा जा सकता है:
यह तरीका किसी कठोर धार्मिक नियम के रूप में नहीं, बल्कि आत्मचिंतन की सरल दिनचर्या के रूप में देखा जा सकता है।
आज की जिंदगी तेज है। मोबाइल स्क्रीन पर लगातार आने वाली सूचनाएँ, काम का दबाव, आर्थिक चिंताएँ और व्यक्तिगत अपेक्षाएँ मन को लगातार सक्रिय रखती हैं। ऐसे वातावरण में पुराने आध्यात्मिक ग्रंथों को पढ़ने का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि हम कुछ समय के लिए बाहरी शोर से हटकर अपने भीतर देखें। गुरूचरित्र अध्याय 14 का धैर्य, श्रद्धा और सदाचार से जुड़ा संदेश आधुनिक जीवन में इसी कारण प्रासंगिक लगता है।
आज मनुष्य अक्सर परिणाम जल्दी चाहता है। नौकरी में तुरंत सफलता, व्यवसाय में तुरंत लाभ, रिश्तों में तुरंत समझ और जीवन में तुरंत समाधान—हर चीज जल्दी चाहिए। लेकिन जीवन की कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएँ धीरे-धीरे विकसित होती हैं। अध्याय की आध्यात्मिक दृष्टि हमें याद दिलाती है कि धैर्य भी एक साधना है। जब हम अपने प्रयास करते हुए परिणाम के प्रति अत्यधिक बेचैनी कम करते हैं, तब निर्णय अधिक स्पष्ट हो सकते हैं।
कठिन परिस्थिति में धार्मिक पाठ मन को सहारा दे सकता है, लेकिन इसे व्यावहारिक प्रयासों का विकल्प नहीं बनाना चाहिए। यदि आर्थिक परेशानी है तो बजट और रोजगार संबंधी कदम भी आवश्यक हैं; यदि पारिवारिक समस्या है तो संवाद और समझ जरूरी है; यदि मानसिक तनाव बहुत अधिक है तो उचित पेशेवर सहायता लेना भी समझदारी है। आध्यात्मिकता और व्यावहारिक जीवन एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
अध्याय 14 से मिलने वाली श्रद्धा और धैर्य की भावना कठिन समय में मानसिक आधार दे सकती है। व्यक्ति यह अनुभव कर सकता है कि वह अपनी समस्या से बड़ा है और परिस्थितियाँ हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं। प्रार्थना मन को स्थिर कर सकती है, जबकि विवेक सही कदम चुनने में मदद करता है। दोनों साथ हों तो कठिन समय में व्यक्ति के भीतर एक ऐसी दृढ़ता विकसित हो सकती है जो केवल बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं रहती।
गुरुचरित्र का संदेश घर-परिवार के व्यवहार में भी उतारा जा सकता है। यदि हम गुरु-भक्ति की बात करते हैं लेकिन घर में माता-पिता, जीवनसाथी, बच्चों या अन्य सदस्यों के प्रति लगातार कठोर व्यवहार करते हैं, तो हमारी साधना अधूरी रह जाती है। विनम्रता, क्षमा, सेवा और सत्य जैसे गुण तभी अर्थपूर्ण होते हैं जब वे हमारे वास्तविक व्यवहार में दिखाई दें।
परिवार में हर व्यक्ति की अपनी अपेक्षाएँ और कमजोरियाँ होती हैं। ऐसे में हर बात को अपनी इच्छा के अनुसार चलाने की कोशिश तनाव बढ़ाती है। गुरु-तत्त्व का स्मरण व्यक्ति को कभी-कभी रुककर यह सोचने में मदद कर सकता है कि इस परिस्थिति में मेरा अहंकार क्या चाहता है और सही व्यवहार क्या है। यही छोटा-सा अंतर रिश्तों में बड़ा बदलाव ला सकता है।
पहली सीख श्रद्धा की है। जब जीवन में परिस्थितियाँ मन के अनुसार न हों, तब भी सकारात्मक और धैर्यपूर्ण दृष्टि बनाए रखना साधना का हिस्सा है। श्रद्धा का अर्थ निष्क्रिय बैठना नहीं, बल्कि सही प्रयास करते हुए भीतर विश्वास बनाए रखना है।
दूसरी सीख सेवा की है। गुरु-भक्ति को केवल व्यक्तिगत लाभ प्राप्त करने का साधन नहीं समझना चाहिए। दूसरों के प्रति दया, सहायता और सम्मान का भाव विकसित करना भी आध्यात्मिक प्रगति का संकेत है।
तीसरी सीख कर्म की है। किसी भी समस्या से केवल प्रार्थना के माध्यम से भागने के बजाय अपनी जिम्मेदारी पूरी करना आवश्यक है। गुरु मार्गदर्शन का प्रतीक हैं, लेकिन जीवन के निर्णय और कर्म हमें स्वयं करने पड़ते हैं।
चौथी सीख धैर्य की है। हर परिस्थिति तुरंत नहीं बदलती। जैसे बीज बोने के बाद पेड़ बनने में समय लगता है, वैसे ही जीवन में किए गए अच्छे प्रयासों का परिणाम भी समय ले सकता है। अधैर्य के कारण अच्छे निर्णयों को बीच में छोड़ देना अक्सर समस्या को बढ़ा देता है।
पाँचवीं सीख आत्मचिंतन की है। धार्मिक पाठ का सबसे बड़ा लाभ तब मिलता है जब वह हमें स्वयं को देखने का अवसर देता है। अध्याय पढ़ने के बाद यदि हम अपने क्रोध, अहंकार, भय या स्वार्थ को पहचान पाते हैं, तो पाठ जीवन में उतरना शुरू कर देता है।
गुरूचरित्र अध्याय 14 को केवल एक धार्मिक कथा की तरह पढ़ने के बजाय गुरु-भक्ति, श्रद्धा, कर्म, सेवा और आत्मचिंतन की दृष्टि से समझना अधिक सार्थक है। इसकी परंपरा भक्त को यह विश्वास देती है कि कठिन परिस्थितियाँ जीवन का अंत नहीं होतीं और सही दृष्टि, धैर्य तथा सदाचार के साथ उनसे आगे बढ़ा जा सकता है। गुरु-कृपा का अर्थ केवल चमत्कार की प्रतीक्षा करना नहीं, बल्कि अपने भीतर विवेक, विश्वास और अच्छे कर्मों को विकसित करना भी है।
आज के व्यस्त जीवन में इस अध्याय का सबसे उपयोगी संदेश शायद यही है कि बाहरी परिस्थितियों को बदलने से पहले अपनी आंतरिक दृष्टि को मजबूत करना चाहिए। श्रद्धा मन को आधार देती है, कर्म जीवन को दिशा देता है और सेवा उस साधना को व्यवहार में बदलती है। इसलिए यदि आप गुरूचरित्र अध्याय 14 का पाठ करते हैं, तो कथा समाप्त होने के बाद कुछ क्षण यह सोचने में भी लगाएँ कि इसकी कौन-सी सीख आपके आज के जीवन में लागू हो सकती है। यही पाठ को केवल पढ़ने से आगे ले जाकर उसे जीवन का हिस्सा बनाने का रास्ता है।
गुरूचरित्र अध्याय 14 को गुरु-भक्ति, श्रद्धा, गुरु-कृपा और आध्यात्मिक आचरण की व्यापक परंपरा के संदर्भ में समझा जाता है। इसके प्रसंग का महत्व केवल कथा में नहीं, बल्कि उससे मिलने वाली जीवन-दृष्टि में भी है।
हाँ, भक्त अपनी श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार इसका दैनिक पाठ कर सकते हैं। यदि आप किसी विशेष पारायण-विधि का पालन कर रहे हैं, तो अपनी परंपरा के जानकार व्यक्ति से उसके नियमों की पुष्टि करना बेहतर है।
भक्ति-परंपरा में गुरुचरित्र के पाठ को श्रद्धा, मन की स्थिरता और आध्यात्मिक चिंतन से जोड़ा जाता है। इसका सबसे व्यावहारिक लाभ यह है कि पाठ व्यक्ति को धैर्य, सदाचार, सेवा और आत्मचिंतन की ओर प्रेरित कर सकता है।
हर भक्त के लिए एक ही समय अनिवार्य मानना उचित नहीं है। शांत वातावरण में, जब मन अपेक्षाकृत स्थिर हो और व्यक्ति बिना जल्दबाजी के पाठ कर सके, तब पढ़ना सुविधाजनक होता है। विशेष धार्मिक नियमों के लिए अपनी गुरु-परंपरा का मार्गदर्शन लिया जा सकता है।
इस अध्याय को व्यापक रूप से देखें तो इसकी महत्वपूर्ण सीख गुरु पर श्रद्धा रखते हुए अपने कर्म, आचरण और जिम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाना है। केवल कृपा की अपेक्षा करने के बजाय अपने भीतर धैर्य, सेवा, विनम्रता और विवेक विकसित करना इसकी आध्यात्मिक भावना को बेहतर ढंग से समझने का तरीका है।
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री सरस्वत्यै नमः ॥
॥ श्री गुरुभ्यो नमः ॥
॥१॥
नामधारक शिष्य देखा ।
विनवी सिद्धासी कवतुका ।
प्रश्न करी अतिविशेखा ।
एकचित्ते परियेसा ॥
॥२॥
जय जयाजी योगीश्वरा ।
सिद्धमूर्ति ज्ञानसागरा ।
पुढील कथा विस्तारा ।
ज्ञान होय आम्हांसी ॥
॥३॥
उदरव्यथेच्या ब्राह्मणासी ।
प्रसन्न झालें श्री गुरुकृपेसी ।
पुढे कथा वर्तली कैसी ।
विस्तारावे आम्हांप्रति ॥
॥४॥
ऐकोनि शिष्याचे वचन ।
संतोषें सिद्ध आपण ।
गुरुचरित्र कामधेनु जाण ।
सांगता जाहला विस्तारोनी ॥
॥५॥
ऐक शिष्या शिरोमणि ।
भिक्षा केली ज्याचे भुवनी ।
तयावरी संतोषोनि ।
प्रसन्न जाहले परियेसा ॥
॥६॥
गुरुभक्तीचा प्रकार ।
पूर्ण जाणे द्विजवर ।
पूजा केली विचित्र ।
म्हणोनि आनंदे परियेसा ॥
॥७॥
तया सायंदेव द्विजासी ।
श्रीगुरू बोलती संतोषी ।
भक्त व्हावें वंशोवंशी ।
माझी प्रीति तुजवरी ॥
॥८॥
ऐकोनि श्रीगुरुचे वचन ।
सायंदेव नमन करून ।
माथा चरणी ठेवून ।
नमता झाला पुनः पुन्हा ॥
॥९॥
जय जयाजी सद्गुरु ।
त्रिमूर्तींचा अवतारू ।
अविद्यामाये दिससी नरु ।
वेदां अगोचरु तुझा महिमा ॥
॥१०॥
विश्वव्यापक तूंचि होसी ।
ब्रह्मा-विष्णु-व्योमकेशी ।
धरिलें स्वरूप तू मानवासी ।
भक्तजन तारावया ॥
॥११॥
तव महिमा वर्णावयासी ।
शक्ति कैंची आम्हांसी ।
मागतो एक तुम्हांसी ।
कृपा करणे गुरुमूर्ति ॥
॥१२॥
माझे वंशपारंपरी ।
भक्ति द्यावी निर्धारी ।
इहे सौख्य पुत्रपौत्री ।
अंती द्यावी सद्गति ॥
॥१३॥
ऐसी विनंति करुनी ।
पुनरपि विनवी करुणावचनी ।
सेवा करितो द्वारी यवनी ।
महाक्रुर असे तो ॥
॥१४॥
प्रतिसंवत्सरी ब्राह्मणांसी ।
घात करितो जो बहुवसी ।
याचि कारणे आम्हांसी ।
बोलावीतसे परियेसा ॥
॥१५॥
जातां तया जवळी आपण ।
निश्चये घेईल माझा प्राण ।
भेटी झाली तुमची म्हणोन ।
मरण कैचे आम्हांसी ॥
॥१६॥
संतोषोनि श्रीगुरूमूर्ति ।
अभय देती तयाप्रती ।
विप्रमस्तकी हस्त ठेविती ।
चिंता न करी म्हणोनिया ॥
॥१७॥
भय सांडूनि त्वां जावे ।
क्रुर यवनातें भेटावे ।
संतोषोनि प्रियभावे ।
पुनरपि पाठवील आम्हांप्रती ॥
॥१८॥
जोवरी परतोनि तू येसी ।
असो आम्ही भरंवसी ।
तू आलिया संतोषी ।
जाऊ मग येथोनिया ॥
॥१९॥
निजभक्त आमुचा तूचि होसी ।
परंपरी-वंशोवंशी ।
अखिलाभीष्ट तू पावसी ।
वाढेल संतति तुझी बहुत ॥
॥२०॥
तुझे वंशपरंपरी ।
सुखे नांदती पुत्रपौत्री ।
अखंड लक्ष्मी तुझें घरी ।
निरोगी शतायु नांदाल ॥
॥२१॥
ऐसा वर लाधोन ।
निघे सायंदेव ब्राह्मण ।
जेथे होता तो यवन ।
गेला त्वरित तयाजवळी ॥
॥२२॥
कालांतक यम देखा ।
यवन दुष्ट परियेसा ।
ब्राह्मणाते पाहतां कैसा ।
ज्वालारूप होता जाहला ॥
॥२३॥
विन्मुख होऊनि गृहांत ।
गेला यवन कोपात ।
विप्र जाहला भयचकित ।
मनीं श्रीगुरू ध्यातसे ॥
॥२४॥
कोप आलिया ओळंबयासी ।
केवी स्पर्शे अग्नीसी ।
श्रीगुरुकृपा असे ज्यासी ।
काय करील यवन दुष्ट ॥
॥२५॥
गरुडाचिया पिलीयांसी ।
सर्प कैसा डंसी ।
तैसी तया ब्राह्मणासी ।
असे कृपा श्रीगुरुची ॥
॥२६॥
कां एखादे सिंहासी ।
ऐरावत केवीं ग्रासी ।
श्रीगुरुकृपा ज्यासी ।
कळीकाळाचे भय नाही ॥
॥२७॥
ज्याचे हृदयीं श्रीगुरुस्मरण ।
भय कैंचे तयां दारुण ।
काळमृत्यु न बाधे जाण ।
अपमृत्यु काय करील ॥
॥२८॥
ज्यासि नांही मृत्यूचे भय ।
त्यासी यवन करील काय ।
श्रीगुरुकृपा ज्यासी होय ।
यमाचे भय नाही तयां ॥
॥२९॥
ऐसियापरी तो यवन ।
गृहीं निघाला भ्रमें करून ।
दृढ निद्रा लागतां जाण ।
शरीरस्मरण नाही त्यासी ॥
॥३०॥
हृदयज्वाळा होऊनी त्यासी ।
जागृत होवोनि परियेसी ।
प्राणांतक व्यथेसी ।
कष्टतसे तये वेळी ॥
॥३१॥
स्मरण नसे कांही ।
म्हणे शस्त्रे मारितो घाई ।
छेदन करितो अवेव पाही ।
विप्र एक आपणासी ॥
॥३२॥
स्मरण जाहले तये वेळी ।
धांवत गेला ब्राह्मणाजवळी ।
लोळतसे चरणकमळी ।
म्हणे स्वामी तूंचि माझा ॥
॥३३॥
तूतें पाचारिले येथे कवणी ।
जावे त्वरित परतोनि ।
वस्त्रे भूषणे देवोनि ।
निरोप देत तये वेळी ॥
॥३४॥
संतोषोनि द्विजवर ।
आला ग्रामीं सत्वर ।
गंगातीरी जाय लवकर ।
श्रीगुरुचे दर्शनासी ॥
॥३५॥
देखोनिया श्रीगुरूसी ।
नमन करी भावेसी ।
स्तोत्र करी बहुवसी ।
सांगे वृत्तांत आद्यंत ॥
॥३६॥
संतोषोनि श्रीगुरूमूर्ति ।
तया द्विजा आश्वासिती ।
दक्षिणदिशें जाऊ म्हणती ।
स्थान तीर्थयात्रेसी ॥
॥३७॥
ऐकोनि श्रीगुरुंचे वचन ।
विनवीतसे कर जोडून ।
न विसंबे आतां तुमचे चरण ।
आपण येईन समागमे ॥
॥३८॥
तुमचे चरणाविणे देखा ।
राहो न शके क्षण एका ।
संसारसागर तारका ।
तूंचि देवा कृपासिंधु ॥
॥३९॥
उद्धरायां सगरांसी ।
गंगा आली भूमीसी ।
तैसा स्वामी आम्हांसी ।
स्पर्शनें उद्धार आपुल्या ॥
॥४०॥
भक्तवत्सल तुझी ख्याति ।
आम्हा सांडणे काय नीति ।
सवेचि येऊ हें निश्चिती ।
म्हणोनि चरणी लागला ॥
॥४१॥
येणेपरी श्रीगुरूसी ।
विनवी विप्र भावेसी ।
संतोषोनि विनयेसी ।
श्रीगुरू म्हणती तये वेळी ॥
॥४२॥
कारण असे आम्हा जाणे ।
तीर्थे असती दक्षिणे ।
पुनरपि तुम्हां दर्शन देणे ।
संवत्सरी पंचदशी ॥
॥४३॥
आम्ही तुमचे ग्रामांसमीपत ।
वास करू हे निश्चित ।
कलत्र पुत्र इष्ट भ्रात ।
तुम्ही आम्हां भेटावें ॥
॥४४॥
न करी चिंता असा सुखे ।
सकळ अरिष्टे गेली दुःखे ।
म्हणोनि हस्त ठेवीं मस्तकी ।
भाक देती तये वेळी ॥
॥४५॥
ऐसेपरी सांगोनि ।
श्रीगुरू निघाले तेथोनि ।
जेथे असे आरोग्यभवानी ।
वैजनाथ महाक्षेत्र तें ॥
॥४६॥
समस्त शिष्यांसमवेत ।
श्रीगुरू आले तीर्थे पहात ।
प्रख्यात असे वैजनाथ ।
तेथे राहिले गुप्तरूपे ॥
॥४७॥
नामधारक विनवी सिद्धासी ।
कारण काय गुप्त व्हावयासी ।
होते शिष्य बहुवसी ।
त्यांसी कोठे ठेविले ॥
॥४८॥
गंगाधराचा नंदन ।
सांगे गुरुचरित्र वर्णन ।
सिद्धमुनि विस्तारून ।
सांगे नामधारकासी ॥
॥४९॥
पुढील कथेचा विस्तार ।
सांगतसे अपरंपार ।
मन करूनि एकाग्र ।
ऐका श्रोते सकळिक ॥
॥५०॥
वास सरस्वतीचे तीरीं ।
सायंदेव साचारी ।
तया गुरुतें निर्धारी ।
वस्त्रें भूषणें दिधलीं ॥
॥५१॥
गुरुचरित्र अमृत ।
सायंदेव आख्यान येथ ।
यवन भय रक्षित ।
थोर भाग्य तयाचें ॥
॥
इति श्रीगुरुचरित्रामृते परमकथाकल्पतरौ
श्रीनृसिंहसरस्वत्युपाख्याने सिद्धनामधारकसंवादे
दुष्टयवनशासनं-सायंदेववरप्रदानं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥
॥ श्रीगुरुदत्तात्रेयार्पणमस्तु ॥
॥ श्रीगुरुदेव दत्त ॥
गुरुचरित्र अध्याय 14: Gurucharitra Adhyay 14 PDF